ग्राम भरखनी पंचायत चुनाव सर्वे 2021

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

📝📝📝📝📝📝📝📝📝📝📝📝📝📝📝

तेरहवाँ शिलालेख पाँच यवन (यूनानी) राजाओं का उल्लेख करता है, जिनके राज्यों में सम्राट अशोक ने धर्मदूत भेजे थे:
1. अंतियोक (सीरिया नरेश)
2. तुरमय (मिस्री नरेश)
3. अंतिकिनी (मेसीडोनिया नरेश)
4. मक (एपीरस नरेश)
5. अलिकसुंदर (सिरीन नरेश)
दूसरा शिलालेख साक्ष्य देता है कि सम्राट अशोक ने यवन साम्राज्य बैक्ट्रिया को भी धर्म-प्रचारक भेजे थे। तत्कालीन गांधार अर्थात् वर्तमान अफगानिस्तान तब यवनों के अधिकार में था। अफगानिस्तान तब बैक्ट्रिया का ही एक भाग था।
सिंहली इतिहास ग्रंथ ‘दीववंश’ तथा ‘महावंश’ उस भिक्षु का नाम तक उल्लेख करते हैं जो धर्म-प्रचार के लिए गांधार गया था। उसका नाम था मञ्झन्तिक।
तिब्बती इतिहासकार तारानाथ उल्लेख करते हैं कि मौर्यवंश, जिसका एक शासक सम्राट अशोक महान भी हुआ है, के एक राजकुमार वीरसेन ने गांधार में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। मौर्यवंश का सीधा-सा अर्थ है- बुद्ध श्रद्धालु शासक।
ये सभी संदर्भ साक्ष्य देते हैं कि गांधार से यूनान, मध्य-पूर्व एशिया और खाड़ी देशों, वर्तमान अरब-ईरान-इराक-फारस, तक बुद्ध के दूतों ने पैर फेरा था।
भारत की पश्चिमी सीमा के बाहर बुद्ध की धर्म-पताका ले जाने का प्रथम श्रेय आचार्य मझन्तिक को है। यद्यपि उनके कार्यकलापों का इतिहास में कोई विस्तृत ब्योरा नहीं मिलता है, लेकिन इस पूरे भू-भाग पर बौद्ध धर्म के जो सुबूत मिलते हैं वो सिद्ध करते हैं कि इस भिक्षु ने बोधिवृक्ष के बीज को बड़ी निष्ठा से बोया था, श्रम से रखवाली की थी, उसे हरियाया-फरियाया था, हरा-भरा किया था।
जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों का उल्लेख मिलता है। ये कथाएँ महायान शाखा की ग्रंथ-संपदा का हिस्सा हैं। थेरवादी इनकी प्रामाणिकता पर संदेह करते हैं लेकिन साहित्यिक दृष्टि से ये अनमोल रचनाएँ हैं। ये कथाएँ नीति व सदाचार की प्रेरक व रोचक कहानियाँ हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। जातक कथाएँ ही कालांतर में ‘पंचतंत्र’ की कहानियों का आधार बनीं।
ईसा की छठी शताब्दी में जरथुस्त नरेश खुसरु के आदेश पर जातक कथाओं का फारसी भाषा में अनुवाद हुआ। आठवीं शताब्दी में ये सीरियाई और अरबी भाषा में अनुवादित हुई- कलिनाग और दामनाग नाम से। जातक कथाओं का फारसी अनुवाद ही भविष्य में ग्रीक, लैटिन व हिब्रु भाषाओं में अनुवाद का आधार बना, जिन्हें चौदहवीं शताब्दी में संत बाइज़ेन्टाईन ने ‘एसप की कथाएँ’ नाम से संकलित किया। फिर यही कथाएँ आगे चलकर ‘सिंदबाद की कहानियाँ’ तथा ‘अरब की रातें’ (दि अरेबियन नाइट्स) के रूप में परिवर्तित हो गईं। ‘सिंदबाद की कहानियाँ’ तक आते-आते, आठवीं शताब्दी तक, जातक कथाओं के पात्र व पृष्ठभूमियाँ बदल गए, उन्होंने स्थानीय अरबी तथा फारसी रूप ले लिए।
फारसी और अरबी संस्कृति में जातक कथाओं को अप्रतिम लोकप्रियता मिली। मध्य-पूर्व एशिया में किसी भी ग्रंथ का शायद इतनी भाषाओं में अनुवाद नहीं हुआ, जितना कि अकेले इस एक ग्रंथ का- जातक कथाओं का- जो कि अब ‘सिंदबाद की कहानियाँ’ नाम से अधिक लोकप्रिय है। इन कहानियों पर अनेक चित्रकथाएँ छपी हैं, फिल्में तक बन चुकी हैं।
आठवीं शताब्दी में दमिश्क के संत जॉन ने बुद्ध की जीवनी का ग्रीक भाषा में अनुवाद किया – ‘बलाम और जोसाफट की कहानी’ नाम से। जोसाफट, जो वस्तुतः बोधिसत्त्व शब्द का ग्रीक उच्चारण है, इतने लोकप्रिय हो गए कि चौदहवीं शताब्दी तक कैथोलिक गिरजाघरों में वह संत जोसफ के रूप में पूजे जाने लगे। अब ईसाई संतों में उनकी संत जोसफ के रूप में गिनती होती है। वह एक मिथकीय संत हैं, जिनकी ऐतिहासिकता के बारे में ईसाइयत मौन है।
पाँचवीं शताब्दी में इस्लाम का उदय हो जाने से मध्य-पूर्व एशिया तथा खाड़ी देशों में बौद्ध धर्म पर वैसा विधिवत् अध्ययन व क्रमिक साहित्य-सृजन नहीं हो सका जैसा कि अन्य बौद्ध देशों में हुआ था। अतः इस पूरे परिक्षेत्र में बौद्ध धर्म की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए स्थानीय साहित्य, बोलचाल के शब्द, लोकाचार, रीति-रिवाजों में बौद्ध धर्म के चिह्न ढूँढ़कर निकालने पड़ते हैं।
जैसे अरबी भाषा का शब्द है- बुत, जिसका अर्थ होता है- मूर्ति। यह ‘बुत’ शब्द वस्तुतः ‘बुद्ध’ शब्द का अरबी रूपांतर है। अरबी लेखकों ने भारतीयों द्वारा पूजित देव अथवा मूर्ति के लिए ‘अल बुद्द’ शब्द का प्रयोग किया है। यह शब्द भी ‘बुद्ध’ शब्द की ओर संकेत कर रहा है। इसी प्रकार ‘अल बुदासफ’ शब्द ‘बोधिसत्त्व’ शब्द का अरबी उच्चारण है, बौद्ध साधुओं के लिए ‘सुमनिय्यास’ शब्द मिलता है जो पालि के ‘समन’ या संस्कृत के ‘श्रमण’ शब्द से व्युत्पन्न है।
तेरहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध अरबी-फारसी इतिहासकार रशीद-अल-दीन ने अरबी में अनुवादित लगभग ग्यारह ग्रंथ, जो कि अरबी-फारसी साहित्य में घुल-मिल गए थे, बौद्ध सूत्रों के रूप में पहचाने हैं, जिनमें ‘सुखावती व्यूह सूत्र’, ‘करंड व्यूह सूत्र’, ‘मैत्रेय व्याकरण’ (आंशिक), ‘अंगुत्तर निकाय’ तथा ‘संयुक्त निकाय’ के ग्रंथ प्रमुख हैं।
दसवीं शताब्दी के फारसी इतिहासकार इब्न-अल-फकीह और तेरहवीं शताब्दी के सीरियाई इतिहासकार वाकूत ने बल्ख़ में एक बौद्ध स्तूप होने की बात स्वीकार की है, जिसमें बौद्ध भिक्षु कुछ कर्म-कांड करते थे। इस्लाम के रहस्यवादी सूफ़ीमत का उदय भी बल्ख़ से ही हुआ। सूफियों का प्रारंभिक नायक इब्राहीम इब्न अदम आठवीं शताब्दी में बल्ख़ से ही भारत आया। राहुल सांकृत्यायन भी शोधात्मक निष्कर्ष देते हैं कि सूफ़ियों का उदय श्रमणों और भिक्षुओं से हुआ।
वस्तुतः सूफी किसी समय श्रमण और भिक्षु ही थे। इस्लाम के उदय के बाद उनका अपनी भूमि से अर्थात भारत से धार्मिक संपर्क कट गया तो उन्होंने स्थानीय मान्यताओं में से ही सूफी मत को जन्म दिया।
सूफियों के सारे रीति-रिवाज बौद्ध भिक्षुओं व श्रमणों के नीति-नियमों का परिवर्तित रूप हैं। यथा, श्रमणों की तरह परिव्राजक जीवन जीना, घूमते रहना। सूफ़ीमत में परिव्राजकों को ‘कलंदर’ कहते हैं। भिक्षुओं की तरह कासा अर्थात् कटोरा यानी भिक्षा-पात्र धारण करना, भिक्षा माँगना। चीवर की तरह विशेष लिबास पहनना। किसी सूफी सिलसिले में उस लिबास को ‘कमली’, कहीं ‘गुदड़ी’ और कहीं ‘कफनी’ कहते हैं। सूफियों में भी बौद्ध पंथों की तरह गुरु-शिष्य परंपरा है। वह पंथ या परंपरा को ‘सिलसिला’ कहते हैं। सूफियों में भी दीक्षा का विधान है। मरते वक्त बुजुर्ग फ़कीर जिस भी योग्य मुरीद अर्थात् शिष्य को अपना लिबास और कासा दे देता है, वही सिलसिले का अगला वारिस अर्थात् उत्तराधिकारी होता है। यह परंपरा भी बौद्धों से आई। बौद्धों के जेन मत में यह प्रथा अभी भी प्रचलित है।
यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि सूफी मत का चरम विकास भी अंततः भारतीय उपमहाद्वीप में ही हुआ। बाबा फरीदुद्दीन (पाक), ख्वाजा मुइनुद्दीन (अजमेर), ख्याज़ा कुतुबुद्दीन (दिल्ली), हज़रत निजामुद्दीन (दिल्ली), साबिर कलियरी (कलियर, बिहार), वारिस शाह (देवाशरीफ), बंदा नवाज़ गेसूदराज़ (गुलबर्गा, कर्नाटक), शाहमीना शाह वाली (लखनऊ), मीरा साहेब (मिरज-सांगली, महाराष्ट्र), शेख सलीम चिश्ती (फतेहपुर) आदि पूरे भारत में सूफी सिलसिले के विख्यात संत हुए हैं।
अबूबक्र हरीरी सूफ़ी की परिभाषा करते हैं- ‘संपूर्ण शुभाचरणों से पूर्ण, संपूर्ण दुराचरणों से मुक्त।’ और शहाबुद्दीन सुहरवर्दी परिभाषित करते हैं- ‘पवित्र जीवन, त्याग और शुभ गुण जहाँ इकट्ठा हों।’
इन परिभाषाओं के प्रकाश में, बौद्धों के शील और विनय सूफियों के भी आदर्श रहे हैं।
भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि-अवशेषों पर आठ स्तूप बनवाए गए। दो स्तूप और भी बनवाए गए जिसमें क्रमशः भगवंत के अंतिम संस्कार में प्रयुक्त हुए बर्तन तथा फूल (राख) स्थापित किए गए।
भगवान् बुद्ध के समकालीन प्रधान भिक्षुओं-सारिपुत्र, मौदगल्यायन, महाकाश्यप, आनंद आदि के निर्वाण के बाद भी उनके अस्थि-अवशेषों पर स्तूप बनवाए गए। साँची स्तूप में सारिपुत्र, मौदगल्यायन के अस्थि-अवशेष अभी भी रखे हैं।
तब से बौद्धों में यह परंपरा रही है कि मठ अथवा विहार के प्रमुख की मृत्यु के बाद उसके अस्थि-अवशेषों पर स्तूप बनाया जाता है।
स्तूप-निर्माण के पीछे बहुत बड़ा आध्यात्मिक विज्ञान रहा है। आध्यात्मिक रूप से उन्नत योगी, साधु, भिक्षु, संत, फ़कीर के शरीरांत के बाद भी उसके अवशेष ऊर्जामय रहते हैं। वह ऊर्जा ग्रहणशील श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक विकास में मदद करती है।
इसी स्तूप परंपरा ने सूफियों में मज़ार या दरगाह का रूप ले लिया। फर्क यह हो गया कि भारतीय बौद्धों में शरीर का अग्नि संस्कार किया जाता था और सूफ़ियों में दफनाया जाता है।
मध्यकाल की संत परंपरा में संतों के देहावसान के बाद उनकी समाधि बनाने का प्रचलन शुरू हुआ। स्तूप, समाधि और मज़ारें आध्यात्मिक ऊर्जा का एक जाग्रत केंद्र होती हैं।
सूफी फकीरों ने तो फ़कीर माना ही उसे है जिसकी समाधि भी जाग्रत हो। सत्रहवीं शताब्दी के पंजाब के सूफ़ी फ़कीर सुल्तान बाहू के कलाम की एक पंक्ति है:
नाम फ़कीर तिना दा बाहू
कब्र जिना दी जीवे हू
-बाहू, फ़कीर उन्हें कहते हैं जिनकी कब्र, मज़ार भी जीवित होती है।
और, सूफ़ी फ़कीरों ने अपने गुरु के लिए ‘बुत’ शब्द का प्रयोग भी किया है। बुत, जो कि ‘बुद्ध’ शब्द से व्युत्पन्न है। सुल्तान बाहू की ही पंक्तियाँ हैं:
की होया बुत दूर गया जे
दिल हरगिज दूर न थीवे हू
सौ कोहाँ ते वसदा मुरशिद
विच्च हुजूर दिसीवे हू
-क्या हुआ जो मेरा बुत, अर्थात् गुरु, दूर चला गया, दिल दूर नहीं होना चाहिए। मेरा मुरशिद, गुरु, सैकड़ों हाथ दूर रहता है, मगर मैं उसे, अपने हुजूर को, अपने दिल में देख लेता हूँ।
इसी प्रकार सूफ़ियों का ‘फकीर’ शब्द भी बौद्धों के ‘भिक्षु’ शब्द का समानार्थी है।
ये सभी संदर्भ सूफ़ियों के बौद्धों से घनिष्ठ अंतर्संबंधों को दर्शाते हैं।
फारस, अरब, ईरान व अन्य खाड़ी देशों तथा यूनान में बौद्ध धर्म की गतिविधियों को तीन चरणों में देखा जा सकता है।
प्रथम चरण में, ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचारक यूनान देशों तथा गांधार एवं कम्बोज (वर्तमान ईरान) में भेजे, इस काल में बौद्ध धर्म का सघन केंद्र बल्ख, बैक्ट्रिया के आसपास केंद्रित रहा। ये दोनों भू-भाग वर्तमान अफगानिस्तान में हैं। ईरान के उत्तर-पूर्वी नगर खुरासान तक पहुँचते-पहुँचते वह उतना प्रभावी नहीं रह गया।
ईरान प्राचीनकाल में ‘कम्बोज’ कहलाता था। बौद्ध गतिविधियों के कारण शताब्दियों बाद वह भू-भाग ईरान हो गया। ‘ईरान’ शब्द पालि के ‘अरिय’ अथवा संस्कृत के ‘आर्य’ शब्द के अपभ्रंश उच्चारण से बना है। बौद्ध शब्दावली में ‘अरिय’ या ‘आर्य’ शब्द श्रेष्ठ, शाश्वत, स्वामी, त्रिकाल सत्य आदि के अर्थों में प्रयुक्त हुआ है- चार आर्य सत्य, आर्य अष्टांगिक मार्ग, आर्यभूमि, आर्यसंघ आदि बुद्ध की देशनाओं में बार-बार प्रयुक्त हुए हैं। ‘आर्य’ शब्द से व्युत्पन्न होकर कम्बोज भू-भाग ‘आर्यान’ और बाद में ‘ईरान’ हो गया। ईरान में अभी भी आर्य मेहर यूनिवर्सिटी है और ‘आर्य मेहर’ उस देश का सर्वोच्च राजकीय सम्मान भी है, जो 1978 में सम्राट् रज़ा पहलवी को मिला था। कालांतर में ‘आर्य ‘ शब्द नस्लवाद से भी जोड़कर देखा जाने लगा, जिस कारण वर्तमान भारतीय इतिहास में आर्य-अनार्य का विवाद अभी तक चल रहा है।
बौद्धों और यूनानियों के सम्मिलन का चरम विकास हमें ईसा पूर्व 150 में यूनानी राजा मिनांडर के काल में दिखाई देता है जब भिक्षु नागसेन ने राजा के पाँच सौ एक दार्शनिक व आध्यात्मिक प्रश्नों के अकाट्य जवाब देकर इस सम्राट् को बौद्ध बना लिया। यूनानी राजा मिनांडर, जो अब बुद्ध भक्त मिलिन्द हो गया था, और भिक्षु नागसेन का प्रसिद्ध संवाद ‘मिलिंद पन्हो’ अर्थात् ‘मिलिंद-प्रश्न’ पुस्तक में संगृहीत हैं। यह पुस्तक एक धर्मग्रंथ की तरह ‘त्रिपिटक’ में शामिल है।
राजा मिलिंद के राज्य की मुख्य राजधानी सागल (वर्तमान पाकिस्तान की स्यालकोट) नगरी थी और उपराजधानी वालीक नगर (अब के अफगानिस्तान का बल्ख) था। उसी काल में यूनान की मूर्तिकला का गांधार कला से मिलन हुआ और मूर्तिकला की गांधार शैली विकसित हुई। गांधार शैली की बुद्ध-मूर्तियों में यूनानी कला की मांसलता और भारतीय कला की आध्यात्मिकता का समन्वित रूप दिखाई देता है।
दूसरे चरण में बौद्ध धर्म का विकास बौद्ध व्यापारियों के उपासक वर्गों द्वारा हुआ। ईसा की दूसरी शताब्दी तक भारत से अरब तक एक सजीव व्यापारिक मार्ग तैयार हो गया था, जो सिंध, अफगानिस्तान, खाड़ी से होते हुए भूमध्य सागर तक जाता था। दक्षिण भारत की रेशम की अरब देशों में बहुत माँग थी। बैक्ट्रिया और गांधार के रास्ते इतनी अधिक रेशम का निर्यात होता था कि इतिहास में उसे ‘रेशम-मार्ग’ ही कहा जाने लगा था। इस व्यापारी मार्ग पर यात्रियों-व्यापारियों की सुविधा के लिए, व्यापारियों के ही योगदान से, अनेक सराय, विहार, मठ आदि की शृंखला-सी निर्मित होती चली गई। पहाड़ी रास्तों पर गुफाएँ निर्मित हुईं, जिनकी दीवारों पर बुद्ध की जीवन-गाथाएँ शिल्पित की गईं। पहाड़ के पहाड़ तराशकर बुद्ध की मूर्तियाँ प्रकट कर दी गईं। बामियान की विशाल बुद्ध-मूर्ति उसी सजीव शृंखला का एक नमूना थी, जिसे मार्च, 2002 में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने ध्वस्त कर दिया। बौद्ध मूर्तिकला में मथुरा-शैली के बाद गांधार-शैली ने ही मूर्तिकला का चरम उत्कर्ष प्राप्त किया है। अफगानिस्तान का केंद्रीय संग्रहालय आज भी बुद्ध-मूर्तियों से भरा हुआ है।
व्यापारियों के साथ सिर्फ वस्तुओं का ही विनिमय नहीं होता बल्कि उनके साथ शब्द और परंपराएँ भी यात्रा करती हैं। शब्दों की यात्रा में कदाचित् साहित्यकारों से भी अधिक व्यापारियों का योगदान है।
यूनान के लोगों को भारत की इलायची बहुत पसंद थी, इसलिए संस्कृत में इलायची का नाम ही हो गया- यवनप्रिय। नाटकों में पर्दे का प्रचलन सर्वप्रथम यूनान में हुआ। इसलिए संस्कृत नाटकों में पर्दे के लिए ‘यवनिका’ शब्द रचा गया। गणित भारत की देन है, इसलिए अरबी में गणित को- इल्मे हिंदसाँ- कहा जाने लगा।
इसी व्यापारिक काल में बुत, अल-बुद्द, बुदासफ, बहार, नवबहार, बरमक आदि शब्द भी अरबी भाषा में शामिल हो गए। ‘बहार’ शब्द ‘विहार’ से बना है। ‘नवबहार’ शब्द ‘विहार’ अर्थात् नवनिर्मित विहार के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । ‘बरमक’ शब्द संस्कृत के ‘प्रमुख’ शब्द का अपभ्रंशित रूप है। ‘प्रमुख’ वस्तुतः ‘विहार प्रमुख’ के अर्थ में प्रयोग होता था। आठवीं-नवीं शताब्दी तक बल्ख़ के आसपास ‘बरमक’ नाम का बाकायदा एक वंश बन गया था। अरबी लेखकों ने ‘बरमक’ शब्द को बल्ख़ शहर के नवबहार पूजा-स्थल के ‘मुख्य पुजारी’ के अर्थ से व्युत्पन्न पाया है। निश्चित ही वह ‘नवबहार’ बल्ख़ का कोई नवनिर्मित विहार रहा होगा जिसके प्रमुख कालांतर में बरमक हो गए। फारसी में ‘नवबहार’ शब्द ‘नवीन मठ’ अथवा ‘मदरसा’ के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है। मदरसों ने ही वर्तमान इस्लामी अध्ययन केंद्रों का रूप ले लिया। फारस का ‘नवबहार’ मठ किसी समय बौद्ध विश्वविद्यालयों की शैली पर इस्लामी अध्ययन का विशाल केंद्र रहा है। भारत के वर्तमान प्रांत बिहार का नामकरण भी बारहवीं शताब्दी के मुस्लिम शासकों द्वारा ही किया गया। गुलाम वंश के संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने जब सन् 1157 में नालंदा के नौमंजिले ग्रंथालय एवं विहार को कोई सैन्य किला समझकर ध्वस्त किया, बौद्ध ग्रंथों के विशाल संग्रह में आग लगा दी, तब प्रारंभ में उस परिक्षेत्र को मुस्लिम शासकों ने ‘बहार’ नाम दिया, जो बाद में ‘बिहार’ बन गया।
सुप्रसिद्ध इतिहासकार अल-बैरूनी, 11 वीं शताब्दी में, लिखता है- ‘खुरासान, पेरसिस, इराक, मोसुल और सीरिया तक का भू-भाग बौद्ध था।’
अभी आठवीं शताब्दी के शुरू तक, ई ० 712 में, मुहम्मद बिन कासिम के भारतीय सीमा पर आक्रमण के समय तक, सिंध में बौद्ध शासक दाहिर का शासन हुआ करता था। उसके ब्राह्मण मंत्री चच ने मुहम्मद बिन कासिम से षड्यंत्र करके दाहिर की हत्या कर दी। तब से सिंध का द्वार भारत पर आक्रमण के लिए हमेशा के लिए खुल गया। चच स्वयं राजा हो गया। उसने बौद्धों पर भयंकर अत्याचार किए।
इतिहासकार प्रोफेसर सुरेन्द्रनाथ सेन का मत है कि मुस्लिम आक्रमणों द्वारा बौद्ध जबरन ही मुसलमान नहीं बने बल्कि ब्राह्मण शासकों के अत्याचारों से पीड़ित होकर स्वेच्छा से भी बड़ी संख्या में बौद्ध मुसलमान हो गए।
तीसरा चरण फारस पर मंगोल शासकों के आधिपत्य के साथ शुरू होता है। तेरहवीं शताब्दी में, ई. 1256 में, मंगोलों के इल्खानीद वंश ने फारस पर कब्जा कर लिया। मंगोलिया के खान पहले ही बौद्ध हो चुके थे। उन्हें तिब्बतियों ने बौद्ध बनाया था। लगभग चालीस वर्षों तक, जब तक फारस के मंगोल शासक गाज़ान खाँ ने ई. 1295 में इस्लाम स्वीकार नहीं कर लिया, फारस में बुद्ध विहारों व मठों का खूब निर्माण हुआ, बौद्ध धर्म की गतिविधियों को संरक्षण दिया गया। लेकिन नव मुस्लिम बने मंगोल शासक गाज़ान खाँ ने अपने पूर्वजों के किए-धरे पर पानी फेर दिया- उसने विहारों व मठों को ध्वस्त कर देने अथवा उन्हें मस्जिदों में तब्दील कर देने का शासकीय आदेश निकाल दिया। वैसा ही हुआ भी।
परिणामस्वरूप फारस की प्राचीन मंगोल राजधानी मारागेह के निकट रसतखानेह और वरजुवी की गुफाओं, जो अब इस्लामी रूप ले चुकी हैं, में आज की अजंता-एलोरा का रूप देखा जा सकता है और काकेशश के दागिस्तान में गुंबदनुमा विशाल भवन को कोई भी स्तूप के रूप में पहचान सकता है, जिसके शिखर पर ध्वजा भी फहरा रही है- अब बौद्धों का पंचशील ध्वज नहीं बल्कि इस्लामी ध्वज।
बौद्धों के साहस, उत्साह और प्रयासों की परीक्षा हमेशा होती रही है। बुद्धि बल में तो वे पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाते रहे, बुद्ध की धम्म-सत्ता कायम करते रहे, लेकिन चूँकि वे भगवंत के अहिंसा व्रत से स्वभावतः बँधे हैं, इसलिए हिंसात्मक अवरोध देखकर ‘साधु-साधु-साधु’ कहते हुए प्रायः शांत हो गए, क्योंकि घृणा व हथियार मैत्री और करुणा की भाषा नहीं समझते।
बौद्धों ने फारस नरेश उल्दजैतू (ULDJAITU) खाँ (ई. 1305-16) को बुद्ध अनुयायी बनाने का एक प्रयास और किया, फिर अंततः वे बौद्ध स्वयं ही सूफी बनकर उग्र इस्लाम की नरम शाखा बन गए। आगे चलकर इस्लाम की बढ़ोतरी में तलवार से ज्यादा सूफ़ियों के प्यार ने योगदान दिया है।
(“बुद्ध का चक्रवर्ती साम्राज्य”, पुस्तक से। इस आलेख को बिना सन्दर्भ के उपयोग करना काॅपीराइट के विधिक दायरे में आता है।)

Facebook

Rahul Singh Bauddha द्वारा प्रकाशित

नाम शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम व पोस्ट खदिया नगला भरखनी जिला हरदोई थाना पाली तहसील सवाजपुर उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

Create your website with WordPress.com
प्रारंभ करें
%d bloggers like this: