मंदिर प्रवेश के प्रारंभ में घंटा क्यो होता है? देवदासी प्रथा क्या है?

मंदिर प्रवेश के प्रारंभ में घंटा क्यो होता है???

देवदासी प्रथा ब्रह्मणी संस्कृति का एक पुराना और काला अध्याय है।

उस प्रथा मे ‘ब्राह्मण’ गरीब आदिवासी या शूद्र (ओबीसी )की छोटी बालिकाओं को देवताओ को समर्पित होने का नाम देकर उनके माता पिता से दूर कर मंदिर में हवस का शिकार बनाता था।

ब्राह्मण मंदिर के गर्भगृह में देवदासी छोटी फूल सी बालिकाओं का जब मन चाहे तब बलात्कार करता था।

देवदासीओं की स्थिति नर्क सी थी

कई छोटी बालिकाएँ खून बहने से या विशाल काय पुजारी के उनके ऊपर चढ़ने पे श्वास ना ले पाने से मर जाती थीं।

मंदिर के बिल्कुल बाहर गेट पर घंटा इस लिए लटकाया जाता था।

ताकि घंटा बजने पर ब्राह्मण को पता लग सके कि कोई आया है।

और वो धर्म के नाम पे लोगों को मूर्ख बनाकर मिली बच्चीयों के साथ जानवर से भी बदतर और मानवता के लिए कलंकित काम करता है उस हैवानियत पे पर्दा डाल सके।

घंटा एक अलार्म का काम करता था।

समाज के लिये सबसे बड़ा अभिशाप : “ब्राह्मण “

ब्राह्मण का न तो कोई धर्म है न कोई जाति है बल्कि वह एक योजनाबद्ध तरीके से पढ़े लिखे समाज को मूर्ख बनाने की व्यवस्था में लगा रहता है। पढ़िये:—–!!

1 जन्म से पहले ब्राह्मण

2 जन्म के बाद ब्राह्मण

1 शादी से पहले ब्राह्मण

2 शादी वाले दिन ब्राह्मण

1 गाड़ी लेने से पहले ब्राह्मण

2 गाड़ी बेचने से पहले ब्राह्मण

1 एग्जाम से पहले ब्राह्मण

2 परिणाम से पहले ब्राह्मण

3 परिणाम के बाद ब्राह्मण

1 घर की नीव पर ब्राह्मण

2 घर बन जाने के बाद ब्राह्मण

1 कोई हादसा होने पर ब्राह्मण

2 ठीक होने के बाद फिर ब्राह्मण

1 दवाई असर न करे तो ब्राह्मण

2 ज्यादा कर जाए तो भी ब्राह्मण

1 कोई काम न बना तो ब्राह्मण

2 काम बनते ही फिर ब्राह्मण

1 मृत्यु आने से पहले ब्राह्मण

2 मृत्यु होने के बाद ब्राह्मण

1 मृत्यु भोज से पहले ब्राह्मण

2 मृत्यु भोज पर भी ब्राह्मण

1 हवन करने पर ब्राह्मण

2 दूसरे का बुरा करने पर ब्राह्मण

इत्यादि और भी आप जोड़ लें।………..

अब फायदा देखो:

ये जितने भी कर्मकाण्ड मैने नोटिस किये है इनमे सिर्फ और सिर्फ नुक्सान हमारे समाज का है और फायदा केवल और केवल ब्राह्मण का है।

ब्राह्मण की दीर्घायु का कारण और आर्थिक रूप से सम्पन्न होने का कारण।

ब्राह्मण भी हमारी तरह इंसान है लेकिन उसके खाने में और हमारे खाने में जमीन आसमान का अंतर है हमारे अधिकांश भाई बहन जिन फल,सब्जी, जूस और ड्राईफ्रूट्स को तब खाते है जब हम बीमार पड़ते है और डॉक्टर हमारे लोगो को सलाह देता है कि न खाओगे तो मरोगे।

लेकिन ब्राह्मण बचपन से लेकर मृत्यु तक यही सब आहार लेता है और उसे इसके खरीदने की कोई टेंसन नही है क्योकि उसकी सेवा में हमारा 90% समाज लगा हुआ है इतनी सेवा तो उसका परिवार भी नही करता है जितना ख्याल इनका हमारा समाज रखता है।

अब ये बीमार क्यों पड़ेंगे और क्यों जल्दी मरेंगे क्योकि हम जो इन्हें जिन्दा रखते है।

अब जो पैसा ये समाज को मूर्ख बनाकर लेते है वो इन्हें खर्च करने की जरूरत नही पड़ती और हमारे लोग जीवन भर कर्जमुक्त नही हो पाते और इसी क्लेश और टेंसन में हमारे लोग बीमार और अल्पायु में ही मर जाते।

हमारे समाज को अगर तरक्की करनी है तो इन ऐसे पोगां पंडितो का त्याग करना जरूरी है। इनका बहिष्कार कर दो ये परजीवी प्रजाति खुद ही खत्म हो जायेगी।

पाखंडवाद को त्यागकर वैज्ञानिक शिक्षा एव वैज्ञानिक जीवन शैली अपनाकर ही देश का विकास हो सकता है.

🙏जय भीम जय भारत

जय संविधान 🙏

Rahul Singh Bauddha द्वारा प्रकाशित

नाम शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम व पोस्ट खदिया नगला भरखनी जिला हरदोई थाना पाली तहसील सवाजपुर उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं

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