भारतीय जातीय व्यवस्था,परम आदरणीय रजनी कांत शास्त्री जी की कलम से

यादव क्षत्रिय से अहीर-भट्टी राजपूत से नाई आदि
ब्राह्मणि बढ़ई आदि
जाति-परिवर्तन द्वारा जिस प्रकार कितनी जातियाँ हिन्दू समाज के निम्न
स्तरों से उटकर ऊपर की चली गई है, उसी प्रकार कितनी ही जातियाँ ऊपर से
नोचे को चली आई है। उदाहरणत:, यदुवंशीय क्षत्रिय राजकुमार आहुक के
वंशधर अहीर हो गए। शक्तिसंगमतंत्र में लिखा है, “आहुक वंशात् समुद्भुता:
आभीरा इति प्रकीर्तिताः”, अर्थात् अहीर आहक के वंश में उत्पन्न कहे गए है।
समर्थन
जातिविवेकाध्याय के
भी होता है।
यथा-“आहुक जन्मवन्तश्च आभीराः क्षत्रियाऽभवन् ।” अर्थात, आहुक के जन्मे
हुए क्षत्रिय अहीर हो गए। इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि अवश्य ही कुछ
यदुवंशीय क्षत्रिय अवनति को प्राप्त होकर गोपालन आदि अहीरोचित कर्म
करते करते अहीरों में जा मिले हैं, पर आजकल उनकी पहचान मुश्किल है,
जिसका फल यह हया कि सभी अहीर अब अपने को यादव अत्रिय कहने लग
गए हैं। इसी पकार भट्टीवंशीय क्षात्रय फूल और केवल की सन्तान नाई आर
कुम्हार, रके छों की सन्तान (बनिए, देसाऊ, देकाऊ) के वंशधर सुतार और
बढई तथा देवसी के वंशज ऊँटपाल हो गए। टॉड साहब के ‘राजस्थान’ में
जैर लमेर का इतिहास पदिए। इसी प्रकार की जातीय अवनति कुछ पाचाल
ब्राह्मणों की भी हो गई। पांचाल देश के कतिपय ब्राह्मण बई, लोहार, सोनार
आदि शिल्पियों की जीविका लेकर क्रमश: ब्राह्मणि बदई, ब्राह्मणिए लोहार,
ब्राह्मणि सनार आदि संज्ञक जातियों के रूप में विर्तित हो गए। इनमें अभी
तक ब्राह्मणोचित संस्कार, रीक्रिस्म, आप, गादि प्रचलित हैं जिन्हें देखकर
भारत के विद्वानों ने उक्त प्रतियों को उपद्राह्मणों में स्वीकृत कर लिया है। पर
अंधेर तो यह कि उक्त
ब्राह्मणिए बढ़ाईय, लोहारा सोनारों आदि की

देखादेखी सब के सब संकरवर्ण तथा शूद्र-वर्णी बढ़इयों, लोहारों, सोनारों आदि
ने भी, जो चिरकाल से संस्कारहीन थे और जिनमें मद्य-मांसादि का सेवन तथा
विधवाओ का पत्यन्तर-ग्रहणादि शूद्रोचित कर्म अभी तक प्रचलित हैं,
लम्बी-लम्बी चोटियाँ सिर पर रखकर, ललाट में तिलक छापे लगाकर, गले में
जनेऊ तथा पैरों में खड़ाऊँ पहनकर परस्पर ‘पंडितजी-पंडितजी’ कहते और
नमस्कार करते हुए अपने को पांचाल ब्राह्मण बन जाने के लिए सिरतोड़
परिश्रम कर रहे हैं। इनमें से कितने ही अपने को विश्वकर्मा की सन्तान होने
के आधार पर विश्वकर्मा ब्राह्मण बतलाते तथा विश्वकर्मा की रथयात्रा
निकालकर उनकी जयन्ती मनाते है। पर ‘विश्वकर्मा’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त
होता है, (२) जगत्स्रष्टा, और (२) देवशिल्पी। यदि पहला अर्थ लिया जाए तो
नि:शेष मनुष्य जगत्स्रष्टा की सन्तान होने से विश्वकर्मा ब्राह्मण और इसी से
बढ़ड़यों के सजाति हो जायेंगे, जो नहीं हो सकता। और यदि दूसरा अर्थ
लिया जाए तो देवशिल्पी विश्वकर्मा तथा उनकी स्त्री का वर्ण-निर्णय होना
चाहिए, जिससे उनकी सन्तान का वर्ण-निर्णय हो सके। ‘वर्णविवेकचन्द्रिका’ के
३६वें श्लोक के आधार पर विश्वकर्मा ब्रह्मा के चरण से उत्पन्न होने के
कारण शूद्र है और उनके
पुत्र भी शूद्र हैं,

ब्रह्माश्चरणज्जज्ञे विश्वकर्मा प्रतापवान् ।
तस्यात्म जाश्चदुर्द्धर्षाः शूद्रवर्णोप्रतिष्ठिताः ।। ३६ ॥

अर्थ प्रतापी विश्वकर्मा ब्रह्मा के चरण से उत्पन्न हुए और उनके
दुर्द्धर्षपुत्र शूद्र वर्ण में रखे गए। दुर्द्धर्ष वह है जिस पर आक्रमण करना कठिन
है। दाद्धर्ष-दुरतिक्रम। पुन: श्लोक ३७-३९
के
अनुसार,

इन विश्वकर्मा ने मन्मथ गोप की प्रभावती नामक कन्या से विवाह कर
उसमें मालाकार, कर्मा, शंकुकार, कुविन्दक, कुंभकार और कंसकार, ये छह
पुत्र उत्पन्न किए जो सभी शूद्र वर्ण में स्थित हैं। इनमे बढ़इयों का कहीं भी
पता नहीं है और यदि उनका पता भी होता तो वे भी शूद्र वर्ण में ही रखे
शूद्र हैं,
जाते।
‘विष्णु-रहस्य’ के अनुसार विश्वकर्मा वैश्य है। ‘जातिभास्कर’
, पृ० २०८,
श्लोक ३० पढ़िए,

अश्विनौ धनिदो विश्वकर्मा विद्याधरादयः।
वैश्यवर्णः पतिर्ते पां धनदं व्यदधाद्धरिः॥ ३० ॥

अर्थ-दोनो अश्विनीकुमार, कुबेर विश्वकर्मा और विद्याधरादि ये
वैश्यवर्ण वाले हैं। भगवान् विष्णु ने कुबेर को इन लोगों का स्वामी बनाया।
‘विष्णुपुराण’ प्रथम अंश अध्याय १५, श्लोक ११८-२१ के अनुसार विश्वकर्मा
आठवे बसु प्रभास के द्वारा देवगुरु बृहस्पति की बहिन में उत्पन्न हुए लिखे
गए हैं। बाह्मण-निर्णय’, पृ० ४०५ पढिए,

वृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्माचारिणी।
योगसक्ता जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत् ॥
प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य च ।
विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः॥

अर्थ-वृहस्पति की बहिन सुन्दरी और ब्रह्मचारिणी थी। वह योग-बल से
सब जगत् में घूमा करती थी। वह वसुओं में आठवे बसु प्रभव की स्त्री थी।
उसके गर्भ से बड़े भागवाले विश्वकर्मा नामक प्रजापति उत्पन्न हुए।
विष्णु-रहस्य के अनुसार प्रभास क्षत्रिय है। जातिभास्कर, पृ० २०७,
श्लोक ८० पढिये,

इन्द्र प्रद्युम्न चन्द्रार्क बसु रुद्रादयोऽपरे।
मरुतः क्षत्रवर्णत्वाज्जज्ञिरे क्षत्रजीविकाः॥ १० ॥

अर्थ-इन्द्र, प्रद्युम्न, चन्द्र, वसु, रुद्रादि तथा अन्य देवगण क्षत्रिय वर्ण होने
से क्षत्रजीविका वाले हुए।

अब प्रभास-पुत्र विश्वकर्मा का वर्ण-निर्णय कीजिए। प्रभात एक वसु होने
के कारण क्षत्रिय है और उनकी स्त्री वृहस्पति की बहिन होने के कारण ब्राह्मणी
हुई। अत: विश्वकर्मा क्षत्रिय पिता के द्वारा ब्राह्मणी माता में उत्पन्न होने
कारण मन्वादि धर्मशास्त्रकारों के मत जातित: ‘सूत’ हुए जिसका काम रथ
हाँकना है। देवशिल्पी विश्वकर्मा का ब्राह्मण होना कहीं भी लिखा नहीं मिलता
है। यदि बढ़ई भाइयों के सन्तोष के लिए विश्वकर्मा को ब्राह्मण भी मान लें
तो भी इन भाइयों का ब्राह्मण होना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि विश्वकर्मा ने जिस
स्त्री में बढ़इयों को उत्पन्न किया था, वह शूद्रा थी और ब्राह्मण पिता द्वारा शूद्रा
माता में उत्पन्न हुई सन्तान ब्राह्मण न होकर ‘पारशव’ होती है। ‘जातिभास्कर’,
पृ० १९४ तथा १९५ में उद्धृत ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मखंड, अध्याय १०, श्लोक
१९,२० और २१ पढ़िए-

विश्वकर्मा च शूद्राया वीर्याधानं चकार सः।
ततो बभूवः पुत्राश्च नवैते शिल्पकारिणः ॥ १९ ॥
मालाकार: कर्मकारः शंखकार: कुविन्दकः ।
कुंभकार: कंसकार: षडेते शिल्पिना वराः ॥ २० ॥
सूत्राधारश्चित्रकार: स्वर्णकारस्तथैव च।
तास्ते
वर्णसंकराः ॥ २१ ॥

अर्थ-विश्वकर्मा ने शूद्रा में वीर्याधान किया जिससे शिल्पकर्मा के ९
पुत्र हुए। इन ९ शिल्पियों में मालाकार (माली), कर्मकार (लोहार), शंखकार
(शंख की चीजें बनाने वाले), कुविन्दक (जुलाहा), कुम्हार और केसरा, ठठेरा,
तमेड़ा आदि ये ६ श्रेष्ठ हैं तथा सूत्रधार (बढ़ई), चितेरा और सोनार ये तीन
ब्रह्मशाप के कारण पतित और अयाज्य वर्ण-संकर है। अयाज्य वे हैं जिनको
यज्ञकर्म का अधिकार नहीं है।

पहले दिन ब्राह्मणिए बढ़इयों आदि उपब्राह्माणों का उल्लेख हुआ है,
उनका इन विश्वकर्मा से कोई वंश का सम्बन्ध नहीं मालूम पड़ता, सिवा इसके
कि उन लोगों ने विश्वकर्मा के वंशजों का पेशा अख्तियार कर लिया है।
उनकी उत्पत्ति ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड में लिंगपुराणोक्त शैवागम के आधार पर यों
लिखी है कि ब्रह्मा के पुत्र स्वयंभुव मनु ने शिल्पायन, गौरवायन, कायस्थायन
और मागधायन इन चार उपब्राह्मणों को उत्पन्न किया। इनमें शिल्पायन को
सन्तान लोहार, सुनार (बदई), पथरकट, तमेड़े और सोनार हैं। पर शैवागम से
किस ग्रन्थ का अभिप्राय है, यह ‘बाह्माणोत्पत्तिमार्तण्ड’ में नहीं लिखा और
लिंगपुराण में यह कथा नहीं मिलती। अत: इसकी प्रामाणिकता अविश्वसनीय
है।
। अनुमान होता है कि ब्राह्मणिए बढ़ई आदि मूलतः ब्राह्मण ही हैं, पर
पुश्त-दर-पुश्त शिल्पियों का धन्धा करते चले आने से बाह्मणत्व से गिरकर
उपब्राह्मण हो गये। ब्राह्मणिए बदइयों और ब्राह्मणिए सोनारों की तरह क्षत्रिय
बढ़ई और क्षत्रिय सोनार भी होते हैं जो मूलतः क्षत्रिय थे। इसी प्रकार चमर
बढ़ई भी होते हैं जो मूलत: चमार थे।

परम आदरणीय रजनी कांत शास्त्री जी की कलम से साभार:-

नमो बुद्धाय 🙏🙏🙏
जय भीम 🙏🙏🙏
भवतु सब्ब् मंगलम् 🙏
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

जागो और जगाओ अंधविश्वास भगाओ विज्ञान अपनाओ🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Rahul Singh Bauddha द्वारा प्रकाशित

नाम शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम व पोस्ट खदिया नगला भरखनी जिला हरदोई थाना पाली तहसील सवाजपुर उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं

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