मंदिर प्रवेश के प्रारंभ में घंटा क्यो होता है? देवदासी प्रथा क्या है?

मंदिर प्रवेश के प्रारंभ में घंटा क्यो होता है???

देवदासी प्रथा ब्रह्मणी संस्कृति का एक पुराना और काला अध्याय है।

उस प्रथा मे ‘ब्राह्मण’ गरीब आदिवासी या शूद्र (ओबीसी )की छोटी बालिकाओं को देवताओ को समर्पित होने का नाम देकर उनके माता पिता से दूर कर मंदिर में हवस का शिकार बनाता था।

ब्राह्मण मंदिर के गर्भगृह में देवदासी छोटी फूल सी बालिकाओं का जब मन चाहे तब बलात्कार करता था।

देवदासीओं की स्थिति नर्क सी थी

कई छोटी बालिकाएँ खून बहने से या विशाल काय पुजारी के उनके ऊपर चढ़ने पे श्वास ना ले पाने से मर जाती थीं।

मंदिर के बिल्कुल बाहर गेट पर घंटा इस लिए लटकाया जाता था।

ताकि घंटा बजने पर ब्राह्मण को पता लग सके कि कोई आया है।

और वो धर्म के नाम पे लोगों को मूर्ख बनाकर मिली बच्चीयों के साथ जानवर से भी बदतर और मानवता के लिए कलंकित काम करता है उस हैवानियत पे पर्दा डाल सके।

घंटा एक अलार्म का काम करता था।

समाज के लिये सबसे बड़ा अभिशाप : “ब्राह्मण “

ब्राह्मण का न तो कोई धर्म है न कोई जाति है बल्कि वह एक योजनाबद्ध तरीके से पढ़े लिखे समाज को मूर्ख बनाने की व्यवस्था में लगा रहता है। पढ़िये:—–!!

1 जन्म से पहले ब्राह्मण

2 जन्म के बाद ब्राह्मण

1 शादी से पहले ब्राह्मण

2 शादी वाले दिन ब्राह्मण

1 गाड़ी लेने से पहले ब्राह्मण

2 गाड़ी बेचने से पहले ब्राह्मण

1 एग्जाम से पहले ब्राह्मण

2 परिणाम से पहले ब्राह्मण

3 परिणाम के बाद ब्राह्मण

1 घर की नीव पर ब्राह्मण

2 घर बन जाने के बाद ब्राह्मण

1 कोई हादसा होने पर ब्राह्मण

2 ठीक होने के बाद फिर ब्राह्मण

1 दवाई असर न करे तो ब्राह्मण

2 ज्यादा कर जाए तो भी ब्राह्मण

1 कोई काम न बना तो ब्राह्मण

2 काम बनते ही फिर ब्राह्मण

1 मृत्यु आने से पहले ब्राह्मण

2 मृत्यु होने के बाद ब्राह्मण

1 मृत्यु भोज से पहले ब्राह्मण

2 मृत्यु भोज पर भी ब्राह्मण

1 हवन करने पर ब्राह्मण

2 दूसरे का बुरा करने पर ब्राह्मण

इत्यादि और भी आप जोड़ लें।………..

अब फायदा देखो:

ये जितने भी कर्मकाण्ड मैने नोटिस किये है इनमे सिर्फ और सिर्फ नुक्सान हमारे समाज का है और फायदा केवल और केवल ब्राह्मण का है।

ब्राह्मण की दीर्घायु का कारण और आर्थिक रूप से सम्पन्न होने का कारण।

ब्राह्मण भी हमारी तरह इंसान है लेकिन उसके खाने में और हमारे खाने में जमीन आसमान का अंतर है हमारे अधिकांश भाई बहन जिन फल,सब्जी, जूस और ड्राईफ्रूट्स को तब खाते है जब हम बीमार पड़ते है और डॉक्टर हमारे लोगो को सलाह देता है कि न खाओगे तो मरोगे।

लेकिन ब्राह्मण बचपन से लेकर मृत्यु तक यही सब आहार लेता है और उसे इसके खरीदने की कोई टेंसन नही है क्योकि उसकी सेवा में हमारा 90% समाज लगा हुआ है इतनी सेवा तो उसका परिवार भी नही करता है जितना ख्याल इनका हमारा समाज रखता है।

अब ये बीमार क्यों पड़ेंगे और क्यों जल्दी मरेंगे क्योकि हम जो इन्हें जिन्दा रखते है।

अब जो पैसा ये समाज को मूर्ख बनाकर लेते है वो इन्हें खर्च करने की जरूरत नही पड़ती और हमारे लोग जीवन भर कर्जमुक्त नही हो पाते और इसी क्लेश और टेंसन में हमारे लोग बीमार और अल्पायु में ही मर जाते।

हमारे समाज को अगर तरक्की करनी है तो इन ऐसे पोगां पंडितो का त्याग करना जरूरी है। इनका बहिष्कार कर दो ये परजीवी प्रजाति खुद ही खत्म हो जायेगी।

पाखंडवाद को त्यागकर वैज्ञानिक शिक्षा एव वैज्ञानिक जीवन शैली अपनाकर ही देश का विकास हो सकता है.

🙏जय भीम जय भारत

जय संविधान 🙏

154 विधान सभा शवायजपुर 2021 में कुशवाहा समाज के प्रधानो की सूची

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

खदिया नगला भरखनी जिला हरदोई

भारतीय जातीय व्यवस्था,परम आदरणीय रजनी कांत शास्त्री जी की कलम से

यादव क्षत्रिय से अहीर-भट्टी राजपूत से नाई आदि
ब्राह्मणि बढ़ई आदि
जाति-परिवर्तन द्वारा जिस प्रकार कितनी जातियाँ हिन्दू समाज के निम्न
स्तरों से उटकर ऊपर की चली गई है, उसी प्रकार कितनी ही जातियाँ ऊपर से
नोचे को चली आई है। उदाहरणत:, यदुवंशीय क्षत्रिय राजकुमार आहुक के
वंशधर अहीर हो गए। शक्तिसंगमतंत्र में लिखा है, “आहुक वंशात् समुद्भुता:
आभीरा इति प्रकीर्तिताः”, अर्थात् अहीर आहक के वंश में उत्पन्न कहे गए है।
समर्थन
जातिविवेकाध्याय के
भी होता है।
यथा-“आहुक जन्मवन्तश्च आभीराः क्षत्रियाऽभवन् ।” अर्थात, आहुक के जन्मे
हुए क्षत्रिय अहीर हो गए। इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि अवश्य ही कुछ
यदुवंशीय क्षत्रिय अवनति को प्राप्त होकर गोपालन आदि अहीरोचित कर्म
करते करते अहीरों में जा मिले हैं, पर आजकल उनकी पहचान मुश्किल है,
जिसका फल यह हया कि सभी अहीर अब अपने को यादव अत्रिय कहने लग
गए हैं। इसी पकार भट्टीवंशीय क्षात्रय फूल और केवल की सन्तान नाई आर
कुम्हार, रके छों की सन्तान (बनिए, देसाऊ, देकाऊ) के वंशधर सुतार और
बढई तथा देवसी के वंशज ऊँटपाल हो गए। टॉड साहब के ‘राजस्थान’ में
जैर लमेर का इतिहास पदिए। इसी प्रकार की जातीय अवनति कुछ पाचाल
ब्राह्मणों की भी हो गई। पांचाल देश के कतिपय ब्राह्मण बई, लोहार, सोनार
आदि शिल्पियों की जीविका लेकर क्रमश: ब्राह्मणि बदई, ब्राह्मणिए लोहार,
ब्राह्मणि सनार आदि संज्ञक जातियों के रूप में विर्तित हो गए। इनमें अभी
तक ब्राह्मणोचित संस्कार, रीक्रिस्म, आप, गादि प्रचलित हैं जिन्हें देखकर
भारत के विद्वानों ने उक्त प्रतियों को उपद्राह्मणों में स्वीकृत कर लिया है। पर
अंधेर तो यह कि उक्त
ब्राह्मणिए बढ़ाईय, लोहारा सोनारों आदि की

देखादेखी सब के सब संकरवर्ण तथा शूद्र-वर्णी बढ़इयों, लोहारों, सोनारों आदि
ने भी, जो चिरकाल से संस्कारहीन थे और जिनमें मद्य-मांसादि का सेवन तथा
विधवाओ का पत्यन्तर-ग्रहणादि शूद्रोचित कर्म अभी तक प्रचलित हैं,
लम्बी-लम्बी चोटियाँ सिर पर रखकर, ललाट में तिलक छापे लगाकर, गले में
जनेऊ तथा पैरों में खड़ाऊँ पहनकर परस्पर ‘पंडितजी-पंडितजी’ कहते और
नमस्कार करते हुए अपने को पांचाल ब्राह्मण बन जाने के लिए सिरतोड़
परिश्रम कर रहे हैं। इनमें से कितने ही अपने को विश्वकर्मा की सन्तान होने
के आधार पर विश्वकर्मा ब्राह्मण बतलाते तथा विश्वकर्मा की रथयात्रा
निकालकर उनकी जयन्ती मनाते है। पर ‘विश्वकर्मा’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त
होता है, (२) जगत्स्रष्टा, और (२) देवशिल्पी। यदि पहला अर्थ लिया जाए तो
नि:शेष मनुष्य जगत्स्रष्टा की सन्तान होने से विश्वकर्मा ब्राह्मण और इसी से
बढ़ड़यों के सजाति हो जायेंगे, जो नहीं हो सकता। और यदि दूसरा अर्थ
लिया जाए तो देवशिल्पी विश्वकर्मा तथा उनकी स्त्री का वर्ण-निर्णय होना
चाहिए, जिससे उनकी सन्तान का वर्ण-निर्णय हो सके। ‘वर्णविवेकचन्द्रिका’ के
३६वें श्लोक के आधार पर विश्वकर्मा ब्रह्मा के चरण से उत्पन्न होने के
कारण शूद्र है और उनके
पुत्र भी शूद्र हैं,

ब्रह्माश्चरणज्जज्ञे विश्वकर्मा प्रतापवान् ।
तस्यात्म जाश्चदुर्द्धर्षाः शूद्रवर्णोप्रतिष्ठिताः ।। ३६ ॥

अर्थ प्रतापी विश्वकर्मा ब्रह्मा के चरण से उत्पन्न हुए और उनके
दुर्द्धर्षपुत्र शूद्र वर्ण में रखे गए। दुर्द्धर्ष वह है जिस पर आक्रमण करना कठिन
है। दाद्धर्ष-दुरतिक्रम। पुन: श्लोक ३७-३९
के
अनुसार,

इन विश्वकर्मा ने मन्मथ गोप की प्रभावती नामक कन्या से विवाह कर
उसमें मालाकार, कर्मा, शंकुकार, कुविन्दक, कुंभकार और कंसकार, ये छह
पुत्र उत्पन्न किए जो सभी शूद्र वर्ण में स्थित हैं। इनमे बढ़इयों का कहीं भी
पता नहीं है और यदि उनका पता भी होता तो वे भी शूद्र वर्ण में ही रखे
शूद्र हैं,
जाते।
‘विष्णु-रहस्य’ के अनुसार विश्वकर्मा वैश्य है। ‘जातिभास्कर’
, पृ० २०८,
श्लोक ३० पढ़िए,

अश्विनौ धनिदो विश्वकर्मा विद्याधरादयः।
वैश्यवर्णः पतिर्ते पां धनदं व्यदधाद्धरिः॥ ३० ॥

अर्थ-दोनो अश्विनीकुमार, कुबेर विश्वकर्मा और विद्याधरादि ये
वैश्यवर्ण वाले हैं। भगवान् विष्णु ने कुबेर को इन लोगों का स्वामी बनाया।
‘विष्णुपुराण’ प्रथम अंश अध्याय १५, श्लोक ११८-२१ के अनुसार विश्वकर्मा
आठवे बसु प्रभास के द्वारा देवगुरु बृहस्पति की बहिन में उत्पन्न हुए लिखे
गए हैं। बाह्मण-निर्णय’, पृ० ४०५ पढिए,

वृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्माचारिणी।
योगसक्ता जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत् ॥
प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य च ।
विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः॥

अर्थ-वृहस्पति की बहिन सुन्दरी और ब्रह्मचारिणी थी। वह योग-बल से
सब जगत् में घूमा करती थी। वह वसुओं में आठवे बसु प्रभव की स्त्री थी।
उसके गर्भ से बड़े भागवाले विश्वकर्मा नामक प्रजापति उत्पन्न हुए।
विष्णु-रहस्य के अनुसार प्रभास क्षत्रिय है। जातिभास्कर, पृ० २०७,
श्लोक ८० पढिये,

इन्द्र प्रद्युम्न चन्द्रार्क बसु रुद्रादयोऽपरे।
मरुतः क्षत्रवर्णत्वाज्जज्ञिरे क्षत्रजीविकाः॥ १० ॥

अर्थ-इन्द्र, प्रद्युम्न, चन्द्र, वसु, रुद्रादि तथा अन्य देवगण क्षत्रिय वर्ण होने
से क्षत्रजीविका वाले हुए।

अब प्रभास-पुत्र विश्वकर्मा का वर्ण-निर्णय कीजिए। प्रभात एक वसु होने
के कारण क्षत्रिय है और उनकी स्त्री वृहस्पति की बहिन होने के कारण ब्राह्मणी
हुई। अत: विश्वकर्मा क्षत्रिय पिता के द्वारा ब्राह्मणी माता में उत्पन्न होने
कारण मन्वादि धर्मशास्त्रकारों के मत जातित: ‘सूत’ हुए जिसका काम रथ
हाँकना है। देवशिल्पी विश्वकर्मा का ब्राह्मण होना कहीं भी लिखा नहीं मिलता
है। यदि बढ़ई भाइयों के सन्तोष के लिए विश्वकर्मा को ब्राह्मण भी मान लें
तो भी इन भाइयों का ब्राह्मण होना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि विश्वकर्मा ने जिस
स्त्री में बढ़इयों को उत्पन्न किया था, वह शूद्रा थी और ब्राह्मण पिता द्वारा शूद्रा
माता में उत्पन्न हुई सन्तान ब्राह्मण न होकर ‘पारशव’ होती है। ‘जातिभास्कर’,
पृ० १९४ तथा १९५ में उद्धृत ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मखंड, अध्याय १०, श्लोक
१९,२० और २१ पढ़िए-

विश्वकर्मा च शूद्राया वीर्याधानं चकार सः।
ततो बभूवः पुत्राश्च नवैते शिल्पकारिणः ॥ १९ ॥
मालाकार: कर्मकारः शंखकार: कुविन्दकः ।
कुंभकार: कंसकार: षडेते शिल्पिना वराः ॥ २० ॥
सूत्राधारश्चित्रकार: स्वर्णकारस्तथैव च।
तास्ते
वर्णसंकराः ॥ २१ ॥

अर्थ-विश्वकर्मा ने शूद्रा में वीर्याधान किया जिससे शिल्पकर्मा के ९
पुत्र हुए। इन ९ शिल्पियों में मालाकार (माली), कर्मकार (लोहार), शंखकार
(शंख की चीजें बनाने वाले), कुविन्दक (जुलाहा), कुम्हार और केसरा, ठठेरा,
तमेड़ा आदि ये ६ श्रेष्ठ हैं तथा सूत्रधार (बढ़ई), चितेरा और सोनार ये तीन
ब्रह्मशाप के कारण पतित और अयाज्य वर्ण-संकर है। अयाज्य वे हैं जिनको
यज्ञकर्म का अधिकार नहीं है।

पहले दिन ब्राह्मणिए बढ़इयों आदि उपब्राह्माणों का उल्लेख हुआ है,
उनका इन विश्वकर्मा से कोई वंश का सम्बन्ध नहीं मालूम पड़ता, सिवा इसके
कि उन लोगों ने विश्वकर्मा के वंशजों का पेशा अख्तियार कर लिया है।
उनकी उत्पत्ति ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड में लिंगपुराणोक्त शैवागम के आधार पर यों
लिखी है कि ब्रह्मा के पुत्र स्वयंभुव मनु ने शिल्पायन, गौरवायन, कायस्थायन
और मागधायन इन चार उपब्राह्मणों को उत्पन्न किया। इनमें शिल्पायन को
सन्तान लोहार, सुनार (बदई), पथरकट, तमेड़े और सोनार हैं। पर शैवागम से
किस ग्रन्थ का अभिप्राय है, यह ‘बाह्माणोत्पत्तिमार्तण्ड’ में नहीं लिखा और
लिंगपुराण में यह कथा नहीं मिलती। अत: इसकी प्रामाणिकता अविश्वसनीय
है।
। अनुमान होता है कि ब्राह्मणिए बढ़ई आदि मूलतः ब्राह्मण ही हैं, पर
पुश्त-दर-पुश्त शिल्पियों का धन्धा करते चले आने से बाह्मणत्व से गिरकर
उपब्राह्मण हो गये। ब्राह्मणिए बदइयों और ब्राह्मणिए सोनारों की तरह क्षत्रिय
बढ़ई और क्षत्रिय सोनार भी होते हैं जो मूलतः क्षत्रिय थे। इसी प्रकार चमर
बढ़ई भी होते हैं जो मूलत: चमार थे।

परम आदरणीय रजनी कांत शास्त्री जी की कलम से साभार:-

नमो बुद्धाय 🙏🙏🙏
जय भीम 🙏🙏🙏
भवतु सब्ब् मंगलम् 🙏
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

जागो और जगाओ अंधविश्वास भगाओ विज्ञान अपनाओ🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

क्या यह नाथूराम गोडसे अंग्रेजो के खिलाफ एक भी दिन जेल गया था? Yadunandan Lal Verma Lodhi Rajput

क्या यह नाथूराम गोडसे अंग्रेजो के खिलाफ एक भी दिन जेल गया था?
क्या इस नाथूराम गोडसे ने अंग्रेजों पर एक भी गोली चलाई थी?
यदि यह क्रातिकारी था तो क्या इसने क्रांतिकारियों की कोई मदद की थी?
नाथूराम गोडसे को मुसलमानों का अत्याचार तो दिखाई पड गया लेकिन ब्राह्मण जो दलितों पिछडो पर अन्यान्य अत्याचार करते वह दिखाई क्यो नही पडा?
न जाने कितने मुसलमानों ने हंसते हंसते देश की आजादी पर अपनी कुरवानी दे दी। क्या इस नथुआ गोडसे को मुसलमानों की देशभक्ति दिखाई पडी?
पाकिस्तान के विभाजन का असली गुनाहगार देश की सबर्ण जातियां हैं विशेषकर ब्राह्मण थे जो दलितों पिछडो को कुत्ता बिल्ली के बराबर भी नही मानते।
यदि गांधीजी मुसलमानों का पक्ष ले रहे थे तो यह बात सुभाष चंद्र बोस सरदार भगतसिंह सरदार पटेल आदि किसी क्रांतिकारी ने यह आरोप गांधीजी पर क्यो नही लगाया?
नाथूराम गोडसे आर एस एस का सदस्य रह चुका था। आर एस एस अंग्रेजो का साथ दे रहा था। पाकिस्तान के जनक आर एस एस हिंदू महासभा जैसे संगठन थे। जिन्ना नास्तिक थे। उनके पूर्बज हिंदू थे।
यदि पाकिस्तान का विभाजन न होता तो दलितों और मुसलमानों के गठबंधन से देश की सत्ता दलितों पिछडो और अल्पसंख्यकों के हाथ मे पंहुच जाती।
पाकिस्तान के विभाजन का सबसे बडा फायदा ब्राह्मणों को हुआ।
अबिभाजित भारत मे मुसलमानों के 1947से पहले मुसलमान 35%नौकरियों में थे।
पाकिस्तान विभाजन मुसलमानों की भागीदारी मात्र 1%रह गयी। कांग्रेस शासन मे रिक्त पदो पर ब्राह्मणों की नियुक्तियां की गई। इस समय सरकारी नौकरियों मे ब्राह्मण 80%बैठा हुआ है।

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Yadunandan Lal Lodhi ki qalam se

Hindu dharm ki Sachai tatha Avatar wad । हिन्दू धर्म और उनके अवतार

अवतारों का सच…………..?

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1. मत्स्यावतार:

1-आर्यों के वेदों और पुराणों में वर्णित मत्स्य अवतार का गहन अध्ययन करने से और हजारों शोधों का अध्ययन करने से पता चलता है कि यह एक झूठी कहानी है। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ और ना ही आज तक पूरी दुनिया में कोई ऐसा इंसान हुआ जो व्हेल मछली जैसी भीमकाय मछली को अपने वश कर सके। द्विजो ने मत्स्य अवतार बना कर पहली ईसवी से उन्नीस ईसवी तक के समय में तो मूल निवासियों को मुर्ख बना लिया लेकिन आज बीसवी ईसवी में किये गए हजारों शोधों से यह बात साबित हो गई है कि मत्स्य अवतार की कथा सिर्फ एक झूठ है। तो सच क्या है?

2-सच यह है कि ईसा से 3200 साल पहले यूरेशिया में एक क्रूर जाति उत्पात और विनाश मचाती रहती थी। जिस का नाम “मोगल” था। वहां के शासकों ने उस जाति के सभी आदमियों को पकड़ कर एक बड़ी नाव में बिठा कर बीच समुद्र में छोड़ दिया, और आशा की कि यह जाति समुद्र में दफ़न हो जाये। लेकिन यह भारत जिसको उस समय चमार-दीप कहा जाता था, का दुर्भाग्य था, कि मोगल जाति के लोग भारत में पहुँचे। इसी से मत्स्य अवतार का उदय हुआ।

3-कई दिनों तक समुद्र में भटकने के बाद युरेशियनों को जमीन दिखाई दी थी। इसी से युर्शियनों ने ये कल्पना भी गढ़ी थी कि धरती पानी में स्थित है। 19वी सताब्दी तक सारे भारत के मूल निवासी यही मानते थे कि धरती पानी में है। युरेशियनों ने मत्स्य अवतार की कहानी अपने आप की श्रेठ साबित करने के लिए गढ़ी थी और अपने आपको देवता सिद्ध कर दिया था। बाद में इस कहानी को आगे पीछे कर के वेदों और पुराणों में स्थापित किया गया ताकि किसी को सच्चाई पता ही ना चले। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ, और ना ही यूरेशियन देवता थे। आज ये सच्चाई साडी दुनिया जानती है।

2. कुर्मावतार:

1) वेदों और पुराणों में लिखी हुई कुर्मा अवतार की कहानी भी मत्स्य अवतार की तरह सिर्फ एक झूठ ही है। जब कभी समुद्र मंथन ही नहीं हुआ, तो कुर्मा अवतार कैसे हो गया? अगर कुछ लोग यहाँ सवाल करे तो उन से हमारे कुछ सवाल है:——

1. क्या यूरेशियन पानी पर चलते थे?

2. यूरेशियन पानी पर चलते थे तो वह कौन सी

तकनीक थी?

3. अगर असुर अर्थात राक्षस भी थे, तो असुर को पानी पर चलने की तकनीक कैसे चली? पानी पर चलने की तकनीक पर तो यूरेशियन आर्यों का एकाधिकार था।

4. अगर यूरेशियन आर्य धनवंतरी ने ही अमृत लाना था तो आर्यों ने खुद अपने आर्य भाई धनवंतरी को अमृत लेन को क्यों नहीं कहा?

5. असुरों और आर्यों ने सुमेरु पर्वत को कैसे समुद्र में स्थापित किया और सुमेरु पर्वत को वापिस उसी जगह कौन रख कर गया?

6. लक्ष्मी अपनी जवानी तक समुद्र में क्या कर रही थी?

7. युरेशियनों ने तो अमृत पिया था, तो वो मर क्यों गए? आज तक उस समय का कोई आर्य जिन्दा क्यों नहीं नहीं है?

तो इन सभी सवालों का यह अर्थ निकालता है की समुद्र मंथन कभी नहीं हुआ। यह एक काल्पनिक कहानी है। असल में असुर और आर्यों के संग्राम में आर्यों को हार का मुह देखना पड़ा। सारे आर्य डर के मारे समुद्र के किनारे जा छुपे, और भारत (चमार दीप) छोड़कर भागने वाले थे। उस समय धुर्त विष्णु नाम के आर्य ने कछुए वाली निति अपनाई और कछुए के समान शांत रह कर मूल निवासियों के साथ संधि कर ली। यह संधि आर्यों के लिए अमृत के समान सिद्ध हुई, और आर्यों को भारत (चमार दीप) को नहीं छोड़ना पड़ा।

2) ह संधि समुद्र के किनारे बहुत दिनों के विचार विमर्श के बाद हुई थी इसीलिए समुद्र के किनारे किये गए विचार विमर्श को समुद्र मंथन और उस से निकले परिणाम को आर्यों ने अमृत कहा। कुर्मा अवतार की कहानी तो बाद में युरेशियनों ने अपनी महानता सिद्ध करने के लिए गढ़ी थी। उस समय वह ना तो कोई समुद्र मंथन हुआ और ना ही कोई अमृत नाम की चीज या पेय पदार्थ निकला था। ना समुद्र मंथन हुआ, ना अमृत निकला, अपनी हार को भी इन विदेशी ब्राह्मणों ने अपनी महानता में बदल दिया।

3. वराह अवतार:

1- वराह अवतार की कथा भी हिन्दू पुराणों में बहुत ही गलत ढंग से बताई गई है, जिसमें बताया गया कि हिरणायक्ष ने धरती को चुरा लिया था। धरती को चुरा कर हिरणायक्ष ने पानी में छुपा दिया। विष्णु सूअर बना और हिरणायक्ष को मार कर विष्णु ने धरती को पानी से बाहर अपने दांतों पर निकला। अब यह कितना सत्य है यह तो पाठकगण पढ़ कर ही समझ गए होंगे।

2-बिना बात को घुमाये आप लोगों को सची घटना के बारे बता देते है। असल में हुआ यूँ था की हिरणायक्ष दक्षिण भारत के प्रायद्वीपों का एक महान मूल निवासी राजा था। जिसने सभी यूरेशियन आर्यों को दक्षिण भारत में मार और डरा कर सभी द्वीपों भगा दिया था। देवताओं ने बहुत सी युक्तियाँ लगा ली थी परन्तु हिरणायक्ष एक अपराजय योद्धा था, जिसे कोई भी आर्य प्रत्यक्ष युद्ध में हरा नहीं सकता थथा।

3-हिरणायक्ष ने सारी दक्षिण भारत के सभी द्वीपों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर दिया था। दक्षिण भारत में और उसके आस पास के द्वीप पानी में स्थित थे और आर्यों का उन द्वीपों पर से राज्य समाप्त हो गया था। तो इस घटना को पृथ्वी को पानी के अन्दर ले जा कर छुपाना प्रचारित किया गया। हिरणायक्ष को हराने के लिए एक बार फिर विष्णु ने छल कपट का सहारा लिया और हिरणायक्ष को युद्ध करने समुद्र में ललकारा। पानी में युद्ध करते समय विष्णु ने धोखे से हिरणायक्ष के सर के पीछे वार किया और हिरणायक्ष को मार दिया। हिरणायक्ष को मारने के बाद आर्यों का कुछ द्वीपों पर फिर से राज्य स्थापित हो गया।

4- मूल निवासी कभी इस घटना की सच्चाई ना जन ले इस लिए आर्यों ने विष्णु को भगवान् और हिरणायक्ष को राक्षस या असुर बना कर आम समाज के सामने प्रस्तुत किया। अब अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि यह घटना एक दम काल्पनिक है। क्योकि समुद्र धरती पर है ना की धरती समुद्र में। तो यहाँ प्रश्न उठता है अगर हिरणायक्ष ने धरती को समुद्र में छुपाया तो कैसे? इतना बड़ा समुद्र कहा है जिस मैं पृथ्वी समा सके? ना तो कोई विष्णु अवतार हुआ और ना ही पृथ्वी को पानी के अन्दर छुपाया गया। यह सिर्फ मूल निवासियों को मुर्ख बनाने की चाल मात्र थी।

4. नर सिंह अवतार:

1-नर सिंह अवतार भी मात्र एक कोरी कल्पना है। इस कहानी में बताया गया है की हिरण्यकशपु को मारने के लिए विष्णु नाम के आर्य ने नर सिंह अवतार लिया था। इस कहानी में विष्णु नाम के आर्य ने आधे मानव और आधे सिंह के रूप में अवतार लिया था। लेकिन असल में हुआ यह था कि हिरणायक्ष को मौत के बाद भी उसके भाई हिरण्यकशपु का राज्य बहुत से दक्षिण भारत के द्वीपों पर बाकि था, हिरण्यकशपु को भी प्रत्यक्ष युद्ध में हराना आर्यों के बस की बात नहीं थी। हिरण्यकशपु को देख कर ही आर्य भाग खड़े होते थे। हिरण्यकशपु बहुत शक्तिशाली राजा था। जिसे युद्ध क्षेत्र में तो क्या कोई भी मूल निवासी या आर्य नहीं हरा सकता था। इस लिए आर्यों ने हिरण्यकशपु को मरने के लिए भी छल और कपट का सहारा लिया।

2-आर्यों ने हिरण्यकशपु के बेटे प्रलाह्द को अपनी चाल का मोहरा बनाया। जिस आश्रम में प्रह्लाह्द शिक्षा ग्रहण करने जाता था। उस आश्रम का अध्यापक एक आर्य था। सभी आर्यों ने उस अध्यापक को अपनी और मिला कर और नारद मुनि नाम के अध्यापक को खास तौर पर भेज कर प्रह्लाह्द के मन में वही भगवान् का डर बिठा दिया। जो आज हर मूल निवासी के मन में बैठा हुआ है। विष्णु को महान बता कर उसको भगवान् बता कर प्रह्लाह्द को आर्यों ने अपनी तरफ कर लिया। प्रह्लाह्द ने अपने पिता हिरण्यकशपु के साथ गद्दारी की और विष्णु को भेष बदलवाकर अपने साथ राज महल में ले गया।

3- विष्णु प्रत्यक्ष युद्ध में तो हिरण्यकशपु को हरा नहीं सकता था तो विष्णु नाम के आर्य ने एक योजना के तहत शाम के समय हिरण्यकशपु के घर के अन्दर प्रवेश करते समय दरवाजे के पीछे से प्रहार कर दिया। जिस से हिरण्यकशपु का पूरा पेट फट गया और हिरण्यकशपु की मृत्यु हो गई। बाद में मूल निवासियों को बहुत सी काल्पनिक कहानियां बना कर सुनाई गई।

4-बहुत से झूठे वरदानों की काल्पनिक कहानियां बनाई गई। जैसे की हिरण्यकशपु को वरदान था कि उसे अन्दर-बाहर, ऊपर नीचे, घर में-घर से बाहर और पता नहीं कौन कौन सी जगहों पर मारा नहीं जा सकता था। विष्णु को भगवान् बताया गया। मूल निवासियों को कही सच्चाई का पता ना चल जाये इसलिए विष्णु को नर सिंह अवतार घोषित किया गया। अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि ऐसा मनुष्य होना असंभव है जो आधा आदमी और आधा सिंह हो। यह सब कथाएं आर्यों ने सिर्फ अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए बनाई है।

5. वामन अवतार:

1-यह भी भी एक काल्पनिक कथा है। आप पाठकगण जरा दिमाग पर जोर डालो कोई वामन अर्थात आर्य ब्राह्मण इतना बड़ा हो सकता है कि पूरी पृथ्वी को अपने पाँव के नीचे ला सके। इतनी बड़ी पृथ्वी तो उस मनुष्य के पाँव के नीचे आएगी जो कम से कम पृथ्वी से 80% बड़ा हो। अगर वामन अर्थात ब्राह्मण पृथ्वी से 80% बड़ा हो भी गया तो वो खड़ा कहा था? असल में हुआ ये था कि मूल निवासी राजा महाराज बलि उस समय भारत के बहुत शक्तिशाली राजा थे।

2- सारे आर्य उनसे डरते थे। किसी भी विदेशी आर्य में इतना साहस नहीं था कि आमने सामने की लड़ाई में महाराज बलि को हरा दे। तो आर्यों ने एक छल कपट भरी चाल चली। कुछ ब्राह्मणों को बलि के पास भेजा और मूल निवासी राजा को यज्ञ करने के लिए तैयार किया। मूल निवासी राजा भी ब्राह्मणों की बातों में आ कर यज्ञ के लिए तैयार हो गए। अब महाराज बलि को पूरा यज्ञ करने के लिए ऋग्वेद की सभी बातों को मानना था। जब यज्ञ पूरा हुआ तो ब्राह्मणों के अनुसार यज्ञ के बाद सभी ब्राह्मणों को दान दे कर संतुष्ट करना जरुरी था। क्योकि ऐसा ऋग्वेद में लिखा हुआ है।

3-उस समय एक ब्राह्मण वहा पर आया, जोकि युरेशियनों द्वारा पहले से ही बनाई गई योजना के तहत वहा पर पहुंचा था। उसने महाराज बलि को धोखे से वचन लेकर उसकी मांग पूरी करने पर विवश किया। उस समय महाराज के मूल निवासी गुरु शुक्राचार्य ने महाराज बलि को समझाया भी कि बिना जाने वचन देना अच्छी बात नहीं है। परन्तु महाराज बलि पर तो काल्पनिक स्वर्ग का नशा चढ़ा हुआ था। महाराज बलि से तीन वचन ले कर उस ब्राह्मण ने पहले वचन में महाराज बलि से सारी धरती अर्थात जहाँ जहाँ महाराज बलि का राज है वो सारी धरती मांग ली।

4-दुसरे वचन में समुद्र अर्थात समुद्र में स्थित महाराज बलि के राज्य में आने वाले सभी द्वीपों की धरती मांग ली। और तीसरे वचन में महाराज बलि का सिर मांग लिया। ताकि महाराज बलि जिन्दा ही ना रहे और भविष्य में महाराज बलि द्वारा फिर से युद्ध द्वारा राज्य छिनने के डर ही ना रहे। इस प्रकार धोखे से महाराज बलि को मारा गया और मूल निवासियों को बता दिया गया कि विष्णु ने महाराज बलि को स्वर्ग को भेज दिया।

5-जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था ये सारी कहानी भी मूल निवासियों को मुर्ख बनाने के लिए गढ़ी गई थी और मूल निवासी आज भी ब्राह्मणों की बताई गई झूठी कहानी पर विश्वास करते है। विज्ञान के बजाये अंधविश्वासों पर विश्वास करना आज भी मूल निवासियों की गुलामी का कारण बना हुआ है।

6. परशुराम अवतार:

1-परशुराम का विवरण महाबरत और रामायण दोनों काल्पनिक ग्रंथों में आता है। लेकिन सचाही क्या है कोई नहीं जानता और ना ही जानना चाहता है क्योकि ब्राह्मण समाज लोगों को सच्चाई जानने नहीं देना चाहता। हर ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य परशुराम को अजेय और भगवान् बनाने पर तुला हुआ है। परशुराम कोई भगवान् नहीं है और ना ही जिन्दा है, ये शाश्वत सत्य है। महाराज बलि की मृत्यु के बाद ब्राह्मणों और राजपूतों में बंटे हुए युरेशियनों में लड़ाई हो गई कि ब्राह्मणों और राजपूतों में कौन श्रेष्ठ है।

2- ब्राह्मणों ने छल से राज्य हासिल किया था और राजपूत बल में विश्वास करते थे। इसी विरोध के चलते ब्राह्मणों ने राजपूतों को मारने और अपने से नीच साबित करने के लिए एक और चाल चली। ब्राह्मणों ने अपने एक योद्धा को लड़ाई के लिए तैयार किया, जिसका नाम परशुराम था। परशुराम कुल्हाड़ा चलने में पारंगत था।

3-परशुराम एक आर्य था। तो उसको रूद्र मूल निवासी कोई परसा अर्थात कुल्हाड़ा कैसे दे सकता था? ब्राह्मणों ने राजपूतों में अफवाह फैला दी कि परशुराम को सम्राट शिव संरक्षण प्राप्त है कि परशुराम राजपूतों का विनाश करे। इसी संरक्षण को बाद में आर्यों ने वरदान नाम से प्रचारित किया। अगर वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाये तो परशुराम के समय शिव नाम के रूद्र अर्थात मूल निवासी राजा को मरे हुए कई साल हो गए थे। लेकिन ब्राह्मणों को पता था कि अगर ऐसी अफवाह फैलाई जाये कि परशुराम को मूल निवासी राजा रुद्रों का संरक्षण प्राप्त है तो कोई भी राजपूत परशुराम का विरोध नहीं करेगा और हजारों राजपूत बिना किसी खास मेहनत के मार जायेंगे। क्योकि महा शक्तिशाली और पराक्रमी रूद्र सम्राटों से पुरे भारत के लोग डरते थे। ब्राह्मणों की अफवाह का यही परिणाम भी निकला, हजारों राजपूत डर कर खुद ही मरने के लिए तैयार हो गए।

4- परशुराम की कथा को पढ़ा जाये तो ये बात सपष्ट हो जाती है कि हजारों राजपूतों ने खुद ही अपने परिवार के साथ आत्मदाह कर लिया था। जब देश से राजपूतों की संख्या काफी कम हो गई तब परशुराम नाम के ब्राह्मण को शांति प्राप्त हुई। अगर हम परशुराम का जीवन चरित्र भी देखे तो बहुत सी बातों का पता चलता है कि परशुराम एक नीच गिरा हुआ और क्रूर प्रकृति आदमी था। परशुराम ने अपने पिता के दुसरे विवाह करने में मदद की थी। परशुराम ने अपनी माता को सिर कट कर सिर्फ इस लिए मार दिया था ताकि ऋषि जमदग्नि दूसरी शादी कर सके। जिसे बाद में ब्राह्मणों ने माँ को फिर से जिन्दा करना प्रचारित किया।

5-परशुराम ने सिर्फ ब्राह्मणों की सर्व श्रेष्टता को साबित करने के लिए हजारों राजपूतों को मौत के घाट उतरा था परन्तु ब्राह्मणों के झूठे प्रचार के कारण आज भी राजपूत ब्राह्मणों की गुलामी कर रहे है। अब तो ये मानसिकता राजपूतों में ऐसे घर कर गई है कि कोई भी राजपूत ब्राह्मणों के खिलाफ आवाज उठाना ही नहीं चाहता।

7. राम अवतार:

1-पूरा रामायण एक काल्पनिक कहानी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ना तो राम मर्यादा पुरषोंतम था और ना ही रावण की लंका समुद्र पार थी। राम का जन्म एक यज्ञ के माध्यम से हुआ था। यज्ञ की सचाई आप हमारी दूसरी पोस्ट पर भी पढ़ सकते हो। उस समय दशरथ की उम्र 60 साल की हो चुकी थी और दशरथ बच्चे पैदा करने में असमर्थ था। तो दशरथ ने अपनी पत्नियाँ ब्राह्मणों को दे कर बच्चे पैदा करने की योजना बनाई। तो पुरे देश से ब्राह्मण बुलाये गए,

2-अभी ब्राह्मणों में से तीन ब्राह्मण चुने गए। और उनको दशरथ ने अपनी तीनों रानियाँ सम्भोग करने को दी। इस विधि को उस समय “नियोग विधि” कहा जाता था। तीनों ब्राह्मणों ने दशरथ की तीनों रानियों के साथ कई दिनों तक शारीरिक सम्बन्ध बनाये और उसके परिणाम स्वरूप राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम के चार पुत्र दशरथ को प्राप्त हुए। पाठकगण खुद सोच सकते है ऐसे घटिया कृत्य से प्राप्त राम भगवान् कैसे हो सकता है। राम बहुत गिरा हुआ और नीच आदमी था। यह बात आपको विस्तार से “सची रामायण” से पता चल सकती है। “सची रामायण” सभी पाठकगण ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड कर सकते है और पढ़ सकते है।

3- सची रामायण सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रमाणित किताब है। बाद में ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्टता साबित करने के लिए राम को भी भगवान् बना दिया। और इतना ज्यादा प्रचारित किया कि देश का हर आदमी आज राम को भगवान् की तरह पूजता है।

8. कृष्ण अवतार:

1- कृष्णा अवतार के तो कहने ही क्या। दुनिया का सबसे बड़ा ढोंग कृष्ण को भगवान् प्रचारित करने को बोला जा सकता है। उस कृष्ण को भगवान् बना दिया, जो गाँव की लड़कियों और औरतों को नंगे नहाते हुए देखता था। जिस के नन्द गाँव की हर औरत के साथ शारीरिक सम्बन्ध थे। कृष्ण के शारीरिक सम्बन्ध कुवारी और विवाहित दोनों स्त्रियों के साथ थे। इस विषय पर लगभग सारा साहित्य एक मत है।

2-कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:

‘ ता: वार्यमाणा: पतिभि: पितृभि्भ्रातृभिस्तथा,

कृष्ण गोपांगना रात्रौं रमयंती रतिप्रिया :’ -विष्णुपुराण, 5, 13/59.

अर्थात वे रतिप्रिय गोपियाँ अपने पतियों, पिताओं और भाइयो के रोकने पर भि रात में कृष्ण के साथ रमण करती थी . कृष्ण और गोपियों का अनुचित सम्बन्ध था यह बात भागवत में स्पष्ट रूप से मोजूद हैं, ईश्वर अथवा उस के अवतार माने जाने वाले कृष्ण का जन सामान्य के समक्ष अपने ही गाँव की बहु बेटियों के साथ सम्बन्ध रखना क्या आदर्श था?

3-कृष्ण ने गोपियों के साथ साथ ठंडी बालू वाले नदी पुलिन पर प्रवेश कर के रमण किया. वह स्थान कुमुद की चंचल और सुगन्धित वायु आनंददायक बन रहा था. बाहे फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ दबाना, बाल (चोटी) खींचना, जंघाओं पर हाथ फेरना, नीवी एवं स्तनों को चुन, गोपियों के नर्म अंगो नाखुनो से नोचना, तिरछी निगाह से देखना, हंसीमजाक करना आदि क्रियाओं से गोपियों में कामवासना बढ़ाते हुए कृष्ण ने रमण किया. – श्रीमदभागवत महापुराण 10/29/45

कृष्ण ने रात रात भर जाग कर अपने साथियो सहित अपने से अधिक अवस्था वाली और माता जैसे दिखने वाली गोपियों को भोगा. – आनंद रामायण, राज्य सर्ग 3/47

4-कृष्ण के विषय में जो कुछ आगे पुरानो में लिखा हैं उसे लिखते हुए भी शर्म महसूस होती हैं की गोपियों के साथ उसने क्या-क्या किया इसलिए में निचे अब सिर्फ हवाले लिख रहा हूँ जहा कृष्ण ने गोपियों के यौन क्रियाये की हैं –

– ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय

28-6/18, 74, 75, 77, 85, 86, 105, 109,110,

134, 70.

5-कृष्ण का सम्बन्ध अनेक नारियों से रहा हैं कृष्ण की विवाहिता पत्नियों की संख्या सोलह हज़ार एक सो आठ बताई जाती हैं. धार्मिक क्षेत्र में कृष्ण के साथ राधा का नाम ही अधिक प्रचलित हैं. कृष्ण की मूर्ति के साथ प्राय: सभी मंदिरों में राधा की मूर्ति हैं. लेकिन आखिर ये राधा थी कौन? ब्रह्मावैवर्त पुराण राधा कृष्ण की मामी बताई गयी हैं. इसी पुराण में राधा की उत्पत्ति कृष्ण के बाए अंग से बताई गयी हैं ‘कृष्ण के बायें भाग से एक कन्या उत्पन्न हुई. गुडवानो ने उसका नाम राधा रखा.’

– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 5/25-26

6-‘उस राधा का विवाह रायाण नामक वैश्य के साथ कर दिया गया कृष्ण की जो माता यशोदा थी रायाण उनका सगा भाई था.

– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 49/39,41,49

7-यदि राधा को कृष्ण के अंग से उत्पन्न माने तो वह उसकी पुत्री हुई . यदि यशोदा के नाते विचार करें तो वह कृष्ण की मामी हुई. दोनों ही दृष्टियो से राधा का कृष्ण के साथ प्रेम अनुचित था और कृष्ण ने अनेको बार राधा के साथ सम्भोग किया था ( ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय 15) और यहाँ तक विवाह भी कर लिया था (ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, 115/86-88).

8-इन सभी बातों पर अगर गौर किया जाये तो आप पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि कृष्ण भगवान् कहलाने का कितना अधिकारी है? भागवत गीता के बारे जो कथा प्रचलित है वो भी मात्र झूठ ही है। भागवत गीता भी मूल निवासियों को धर्म की गुलामी में फंसाए रखने का एक षड्यंत्र मात्र है। जो एक आर्य ऋषि व्यास ने लिखा था जिस में अच्छी बातें सिर्फ इस लिए लिखी गई ताकि मूल निवासी शक ना करे और ब्राह्मणों के धर्म जाल में फंसे रहे।

9-महाभारत के नाम पर भी मूल निवासियों को सिर्फ झूठ ही बताया गया है। ना कभी महाभारत का युद्ध हुआ और ना ही गीता युद्ध में कृष्ण ने बोली। यह तो कृष्ण को भगवान् को साबित करने का एक षड्यंत्र मात्र है।

9. बुद्ध अवतार:

1- इस अवतार के बारे तो सारी दुनिया जानती है। बुद्ध काल तक सारे भगवान् और अवतार बलि के नाम पर मांस और खून के प्यासे थे, वो बुद्ध जैसे महान कैसे हो सकते है? बुद्ध शाक्य वंश में पैदा हुआ एक महान मानव था,(शाक्य वंश के बारे विस्तृत जानकारी आप को हमारे आने वाले लेखों में मिलेगी) जिसने ब्राह्मणों के विरुद्ध मूल निवासियों का एक धर्म बनाया और सभी मूल निवासियों को इकठ्ठा किया। मूल निवासियों का यह धर्म बौद्ध धर्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सिद्धार्थ बुद्ध के समय इस धर्म में कोई जाति व्यवस्था नहीं थी। सभी लोग एक सम्मान थे। कोई उंच-नीच नहीं थी। यहाँ तक सिद्धार्थ बुद्ध खुद भी जमीन पर बैठ कर प्रवचन दिया करते थे।

2- यह धर्म कितना महान था इस बात का पता यही से लग जाता है कि 500 ईसवी से 700 ईसवी के बीच बौद्ध धर्म भारत का सर्व श्रेष्ट धर्म बन चूका था। ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त सा हो गया था। भारत में सभी लोग उंच-नीच, जाति-पाति भूलाकर सिर्फ इंसान बनकर रहने लगे थे। कोई भी मूल निवासी ब्राह्मणों को महत्व नहीं देता था और सारे मूल निवासी फिर से रूद्र काल के गौरव को प्राप्त करने के गौरव की और बढ़ रहे थे। इस बात से यूरेशियन आर्यों अर्थात ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई। बौद्ध धर्म को समाप्त करने के लिए फिर से सारे ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य एक हुए और उन्होंने एक चाल चली। बहुत से ब्राह्मण बौद्ध भिक्षु बन गए।

3-बौद्ध धर्म के मत्वपूर्ण टिकानों पर ब्राह्मण बौद्ध भिक्षुयों ने कब्ज़ा कर लिया और राजपूतों ने बौद्ध भिक्षुयों के मठों पर आक्रमण कर दिया। लाखों बौद्ध भिक्षु मारे गए, बौद्ध भिक्षुयों के लिखे ग्रंथ और किताबें जला दी गई। बौद्ध धर्म को पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया। जो बौद्ध भिक्षु बचे वो अपने प्राणों की रक्षा के लिए भाग गए और जंगलों और पहाड़ों में चुप गए। आज फिर से बौद्ध धर्म लोगों के बीच प्रचलित हो रहा है परन्तु आज बौद्ध धर्म में भी उंच-नीच आ गई है। हीनयान ऊँचे माने जाते है और बाकि दोनों संप्रदाय नीच माने जाते है।

4-अब पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि महात्मा बुद्ध विष्णु का अवतार कैसे हो सकते है? जिन द्विजो,राजपूतों और वैश्यों ने बुद्ध धर्म का नाश कर दिया, आज उन्ही यूरेशियन आर्यों को शर्म तक नहीं आती।

Hindu Jim tatha Avatar wad,अवतारों का सच

अवतारों का सच…………..?

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1. मत्स्यावतार:

1-आर्यों के वेदों और पुराणों में वर्णित मत्स्य अवतार का गहन अध्ययन करने से और हजारों शोधों का अध्ययन करने से पता चलता है कि यह एक झूठी कहानी है। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ और ना ही आज तक पूरी दुनिया में कोई ऐसा इंसान हुआ जो व्हेल मछली जैसी भीमकाय मछली को अपने वश कर सके। द्विजो ने मत्स्य अवतार बना कर पहली ईसवी से उन्नीस ईसवी तक के समय में तो मूल निवासियों को मुर्ख बना लिया लेकिन आज बीसवी ईसवी में किये गए हजारों शोधों से यह बात साबित हो गई है कि मत्स्य अवतार की कथा सिर्फ एक झूठ है। तो सच क्या है?

2-सच यह है कि ईसा से 3200 साल पहले यूरेशिया में एक क्रूर जाति उत्पात और विनाश मचाती रहती थी। जिस का नाम “मोगल” था। वहां के शासकों ने उस जाति के सभी आदमियों को पकड़ कर एक बड़ी नाव में बिठा कर बीच समुद्र में छोड़ दिया, और आशा की कि यह जाति समुद्र में दफ़न हो जाये। लेकिन यह भारत जिसको उस समय चमार-दीप कहा जाता था, का दुर्भाग्य था, कि मोगल जाति के लोग भारत में पहुँचे। इसी से मत्स्य अवतार का उदय हुआ।

3-कई दिनों तक समुद्र में भटकने के बाद युरेशियनों को जमीन दिखाई दी थी। इसी से युर्शियनों ने ये कल्पना भी गढ़ी थी कि धरती पानी में स्थित है। 19वी सताब्दी तक सारे भारत के मूल निवासी यही मानते थे कि धरती पानी में है। युरेशियनों ने मत्स्य अवतार की कहानी अपने आप की श्रेठ साबित करने के लिए गढ़ी थी और अपने आपको देवता सिद्ध कर दिया था। बाद में इस कहानी को आगे पीछे कर के वेदों और पुराणों में स्थापित किया गया ताकि किसी को सच्चाई पता ही ना चले। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ, और ना ही यूरेशियन देवता थे। आज ये सच्चाई साडी दुनिया जानती है।

2. कुर्मावतार:

1) वेदों और पुराणों में लिखी हुई कुर्मा अवतार की कहानी भी मत्स्य अवतार की तरह सिर्फ एक झूठ ही है। जब कभी समुद्र मंथन ही नहीं हुआ, तो कुर्मा अवतार कैसे हो गया? अगर कुछ लोग यहाँ सवाल करे तो उन से हमारे कुछ सवाल है:——

1. क्या यूरेशियन पानी पर चलते थे?

2. यूरेशियन पानी पर चलते थे तो वह कौन सी

तकनीक थी?

3. अगर असुर अर्थात राक्षस भी थे, तो असुर को पानी पर चलने की तकनीक कैसे चली? पानी पर चलने की तकनीक पर तो यूरेशियन आर्यों का एकाधिकार था।

4. अगर यूरेशियन आर्य धनवंतरी ने ही अमृत लाना था तो आर्यों ने खुद अपने आर्य भाई धनवंतरी को अमृत लेन को क्यों नहीं कहा?

5. असुरों और आर्यों ने सुमेरु पर्वत को कैसे समुद्र में स्थापित किया और सुमेरु पर्वत को वापिस उसी जगह कौन रख कर गया?

6. लक्ष्मी अपनी जवानी तक समुद्र में क्या कर रही थी?

7. युरेशियनों ने तो अमृत पिया था, तो वो मर क्यों गए? आज तक उस समय का कोई आर्य जिन्दा क्यों नहीं नहीं है?

तो इन सभी सवालों का यह अर्थ निकालता है की समुद्र मंथन कभी नहीं हुआ। यह एक काल्पनिक कहानी है। असल में असुर और आर्यों के संग्राम में आर्यों को हार का मुह देखना पड़ा। सारे आर्य डर के मारे समुद्र के किनारे जा छुपे, और भारत (चमार दीप) छोड़कर भागने वाले थे। उस समय धुर्त विष्णु नाम के आर्य ने कछुए वाली निति अपनाई और कछुए के समान शांत रह कर मूल निवासियों के साथ संधि कर ली। यह संधि आर्यों के लिए अमृत के समान सिद्ध हुई, और आर्यों को भारत (चमार दीप) को नहीं छोड़ना पड़ा।

2) ह संधि समुद्र के किनारे बहुत दिनों के विचार विमर्श के बाद हुई थी इसीलिए समुद्र के किनारे किये गए विचार विमर्श को समुद्र मंथन और उस से निकले परिणाम को आर्यों ने अमृत कहा। कुर्मा अवतार की कहानी तो बाद में युरेशियनों ने अपनी महानता सिद्ध करने के लिए गढ़ी थी। उस समय वह ना तो कोई समुद्र मंथन हुआ और ना ही कोई अमृत नाम की चीज या पेय पदार्थ निकला था। ना समुद्र मंथन हुआ, ना अमृत निकला, अपनी हार को भी इन विदेशी ब्राह्मणों ने अपनी महानता में बदल दिया।

3. वराह अवतार:

1- वराह अवतार की कथा भी हिन्दू पुराणों में बहुत ही गलत ढंग से बताई गई है, जिसमें बताया गया कि हिरणायक्ष ने धरती को चुरा लिया था। धरती को चुरा कर हिरणायक्ष ने पानी में छुपा दिया। विष्णु सूअर बना और हिरणायक्ष को मार कर विष्णु ने धरती को पानी से बाहर अपने दांतों पर निकला। अब यह कितना सत्य है यह तो पाठकगण पढ़ कर ही समझ गए होंगे।

2-बिना बात को घुमाये आप लोगों को सची घटना के बारे बता देते है। असल में हुआ यूँ था की हिरणायक्ष दक्षिण भारत के प्रायद्वीपों का एक महान मूल निवासी राजा था। जिसने सभी यूरेशियन आर्यों को दक्षिण भारत में मार और डरा कर सभी द्वीपों भगा दिया था। देवताओं ने बहुत सी युक्तियाँ लगा ली थी परन्तु हिरणायक्ष एक अपराजय योद्धा था, जिसे कोई भी आर्य प्रत्यक्ष युद्ध में हरा नहीं सकता थथा।

3-हिरणायक्ष ने सारी दक्षिण भारत के सभी द्वीपों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर दिया था। दक्षिण भारत में और उसके आस पास के द्वीप पानी में स्थित थे और आर्यों का उन द्वीपों पर से राज्य समाप्त हो गया था। तो इस घटना को पृथ्वी को पानी के अन्दर ले जा कर छुपाना प्रचारित किया गया। हिरणायक्ष को हराने के लिए एक बार फिर विष्णु ने छल कपट का सहारा लिया और हिरणायक्ष को युद्ध करने समुद्र में ललकारा। पानी में युद्ध करते समय विष्णु ने धोखे से हिरणायक्ष के सर के पीछे वार किया और हिरणायक्ष को मार दिया। हिरणायक्ष को मारने के बाद आर्यों का कुछ द्वीपों पर फिर से राज्य स्थापित हो गया।

4- मूल निवासी कभी इस घटना की सच्चाई ना जन ले इस लिए आर्यों ने विष्णु को भगवान् और हिरणायक्ष को राक्षस या असुर बना कर आम समाज के सामने प्रस्तुत किया। अब अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि यह घटना एक दम काल्पनिक है। क्योकि समुद्र धरती पर है ना की धरती समुद्र में। तो यहाँ प्रश्न उठता है अगर हिरणायक्ष ने धरती को समुद्र में छुपाया तो कैसे? इतना बड़ा समुद्र कहा है जिस मैं पृथ्वी समा सके? ना तो कोई विष्णु अवतार हुआ और ना ही पृथ्वी को पानी के अन्दर छुपाया गया। यह सिर्फ मूल निवासियों को मुर्ख बनाने की चाल मात्र थी।

4. नर सिंह अवतार:

1-नर सिंह अवतार भी मात्र एक कोरी कल्पना है। इस कहानी में बताया गया है की हिरण्यकशपु को मारने के लिए विष्णु नाम के आर्य ने नर सिंह अवतार लिया था। इस कहानी में विष्णु नाम के आर्य ने आधे मानव और आधे सिंह के रूप में अवतार लिया था। लेकिन असल में हुआ यह था कि हिरणायक्ष को मौत के बाद भी उसके भाई हिरण्यकशपु का राज्य बहुत से दक्षिण भारत के द्वीपों पर बाकि था, हिरण्यकशपु को भी प्रत्यक्ष युद्ध में हराना आर्यों के बस की बात नहीं थी। हिरण्यकशपु को देख कर ही आर्य भाग खड़े होते थे। हिरण्यकशपु बहुत शक्तिशाली राजा था। जिसे युद्ध क्षेत्र में तो क्या कोई भी मूल निवासी या आर्य नहीं हरा सकता था। इस लिए आर्यों ने हिरण्यकशपु को मरने के लिए भी छल और कपट का सहारा लिया।

2-आर्यों ने हिरण्यकशपु के बेटे प्रलाह्द को अपनी चाल का मोहरा बनाया। जिस आश्रम में प्रह्लाह्द शिक्षा ग्रहण करने जाता था। उस आश्रम का अध्यापक एक आर्य था। सभी आर्यों ने उस अध्यापक को अपनी और मिला कर और नारद मुनि नाम के अध्यापक को खास तौर पर भेज कर प्रह्लाह्द के मन में वही भगवान् का डर बिठा दिया। जो आज हर मूल निवासी के मन में बैठा हुआ है। विष्णु को महान बता कर उसको भगवान् बता कर प्रह्लाह्द को आर्यों ने अपनी तरफ कर लिया। प्रह्लाह्द ने अपने पिता हिरण्यकशपु के साथ गद्दारी की और विष्णु को भेष बदलवाकर अपने साथ राज महल में ले गया।

3- विष्णु प्रत्यक्ष युद्ध में तो हिरण्यकशपु को हरा नहीं सकता था तो विष्णु नाम के आर्य ने एक योजना के तहत शाम के समय हिरण्यकशपु के घर के अन्दर प्रवेश करते समय दरवाजे के पीछे से प्रहार कर दिया। जिस से हिरण्यकशपु का पूरा पेट फट गया और हिरण्यकशपु की मृत्यु हो गई। बाद में मूल निवासियों को बहुत सी काल्पनिक कहानियां बना कर सुनाई गई।

4-बहुत से झूठे वरदानों की काल्पनिक कहानियां बनाई गई। जैसे की हिरण्यकशपु को वरदान था कि उसे अन्दर-बाहर, ऊपर नीचे, घर में-घर से बाहर और पता नहीं कौन कौन सी जगहों पर मारा नहीं जा सकता था। विष्णु को भगवान् बताया गया। मूल निवासियों को कही सच्चाई का पता ना चल जाये इसलिए विष्णु को नर सिंह अवतार घोषित किया गया। अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि ऐसा मनुष्य होना असंभव है जो आधा आदमी और आधा सिंह हो। यह सब कथाएं आर्यों ने सिर्फ अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए बनाई है।

5. वामन अवतार:

1-यह भी भी एक काल्पनिक कथा है। आप पाठकगण जरा दिमाग पर जोर डालो कोई वामन अर्थात आर्य ब्राह्मण इतना बड़ा हो सकता है कि पूरी पृथ्वी को अपने पाँव के नीचे ला सके। इतनी बड़ी पृथ्वी तो उस मनुष्य के पाँव के नीचे आएगी जो कम से कम पृथ्वी से 80% बड़ा हो। अगर वामन अर्थात ब्राह्मण पृथ्वी से 80% बड़ा हो भी गया तो वो खड़ा कहा था? असल में हुआ ये था कि मूल निवासी राजा महाराज बलि उस समय भारत के बहुत शक्तिशाली राजा थे।

2- सारे आर्य उनसे डरते थे। किसी भी विदेशी आर्य में इतना साहस नहीं था कि आमने सामने की लड़ाई में महाराज बलि को हरा दे। तो आर्यों ने एक छल कपट भरी चाल चली। कुछ ब्राह्मणों को बलि के पास भेजा और मूल निवासी राजा को यज्ञ करने के लिए तैयार किया। मूल निवासी राजा भी ब्राह्मणों की बातों में आ कर यज्ञ के लिए तैयार हो गए। अब महाराज बलि को पूरा यज्ञ करने के लिए ऋग्वेद की सभी बातों को मानना था। जब यज्ञ पूरा हुआ तो ब्राह्मणों के अनुसार यज्ञ के बाद सभी ब्राह्मणों को दान दे कर संतुष्ट करना जरुरी था। क्योकि ऐसा ऋग्वेद में लिखा हुआ है।

3-उस समय एक ब्राह्मण वहा पर आया, जोकि युरेशियनों द्वारा पहले से ही बनाई गई योजना के तहत वहा पर पहुंचा था। उसने महाराज बलि को धोखे से वचन लेकर उसकी मांग पूरी करने पर विवश किया। उस समय महाराज के मूल निवासी गुरु शुक्राचार्य ने महाराज बलि को समझाया भी कि बिना जाने वचन देना अच्छी बात नहीं है। परन्तु महाराज बलि पर तो काल्पनिक स्वर्ग का नशा चढ़ा हुआ था। महाराज बलि से तीन वचन ले कर उस ब्राह्मण ने पहले वचन में महाराज बलि से सारी धरती अर्थात जहाँ जहाँ महाराज बलि का राज है वो सारी धरती मांग ली।

4-दुसरे वचन में समुद्र अर्थात समुद्र में स्थित महाराज बलि के राज्य में आने वाले सभी द्वीपों की धरती मांग ली। और तीसरे वचन में महाराज बलि का सिर मांग लिया। ताकि महाराज बलि जिन्दा ही ना रहे और भविष्य में महाराज बलि द्वारा फिर से युद्ध द्वारा राज्य छिनने के डर ही ना रहे। इस प्रकार धोखे से महाराज बलि को मारा गया और मूल निवासियों को बता दिया गया कि विष्णु ने महाराज बलि को स्वर्ग को भेज दिया।

5-जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था ये सारी कहानी भी मूल निवासियों को मुर्ख बनाने के लिए गढ़ी गई थी और मूल निवासी आज भी ब्राह्मणों की बताई गई झूठी कहानी पर विश्वास करते है। विज्ञान के बजाये अंधविश्वासों पर विश्वास करना आज भी मूल निवासियों की गुलामी का कारण बना हुआ है।

6. परशुराम अवतार:

1-परशुराम का विवरण महाबरत और रामायण दोनों काल्पनिक ग्रंथों में आता है। लेकिन सचाही क्या है कोई नहीं जानता और ना ही जानना चाहता है क्योकि ब्राह्मण समाज लोगों को सच्चाई जानने नहीं देना चाहता। हर ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य परशुराम को अजेय और भगवान् बनाने पर तुला हुआ है। परशुराम कोई भगवान् नहीं है और ना ही जिन्दा है, ये शाश्वत सत्य है। महाराज बलि की मृत्यु के बाद ब्राह्मणों और राजपूतों में बंटे हुए युरेशियनों में लड़ाई हो गई कि ब्राह्मणों और राजपूतों में कौन श्रेष्ठ है।

2- ब्राह्मणों ने छल से राज्य हासिल किया था और राजपूत बल में विश्वास करते थे। इसी विरोध के चलते ब्राह्मणों ने राजपूतों को मारने और अपने से नीच साबित करने के लिए एक और चाल चली। ब्राह्मणों ने अपने एक योद्धा को लड़ाई के लिए तैयार किया, जिसका नाम परशुराम था। परशुराम कुल्हाड़ा चलने में पारंगत था।

3-परशुराम एक आर्य था। तो उसको रूद्र मूल निवासी कोई परसा अर्थात कुल्हाड़ा कैसे दे सकता था? ब्राह्मणों ने राजपूतों में अफवाह फैला दी कि परशुराम को सम्राट शिव संरक्षण प्राप्त है कि परशुराम राजपूतों का विनाश करे। इसी संरक्षण को बाद में आर्यों ने वरदान नाम से प्रचारित किया। अगर वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखा जाये तो परशुराम के समय शिव नाम के रूद्र अर्थात मूल निवासी राजा को मरे हुए कई साल हो गए थे। लेकिन ब्राह्मणों को पता था कि अगर ऐसी अफवाह फैलाई जाये कि परशुराम को मूल निवासी राजा रुद्रों का संरक्षण प्राप्त है तो कोई भी राजपूत परशुराम का विरोध नहीं करेगा और हजारों राजपूत बिना किसी खास मेहनत के मार जायेंगे। क्योकि महा शक्तिशाली और पराक्रमी रूद्र सम्राटों से पुरे भारत के लोग डरते थे। ब्राह्मणों की अफवाह का यही परिणाम भी निकला, हजारों राजपूत डर कर खुद ही मरने के लिए तैयार हो गए।

4- परशुराम की कथा को पढ़ा जाये तो ये बात सपष्ट हो जाती है कि हजारों राजपूतों ने खुद ही अपने परिवार के साथ आत्मदाह कर लिया था। जब देश से राजपूतों की संख्या काफी कम हो गई तब परशुराम नाम के ब्राह्मण को शांति प्राप्त हुई। अगर हम परशुराम का जीवन चरित्र भी देखे तो बहुत सी बातों का पता चलता है कि परशुराम एक नीच गिरा हुआ और क्रूर प्रकृति आदमी था। परशुराम ने अपने पिता के दुसरे विवाह करने में मदद की थी। परशुराम ने अपनी माता को सिर कट कर सिर्फ इस लिए मार दिया था ताकि ऋषि जमदग्नि दूसरी शादी कर सके। जिसे बाद में ब्राह्मणों ने माँ को फिर से जिन्दा करना प्रचारित किया।

5-परशुराम ने सिर्फ ब्राह्मणों की सर्व श्रेष्टता को साबित करने के लिए हजारों राजपूतों को मौत के घाट उतरा था परन्तु ब्राह्मणों के झूठे प्रचार के कारण आज भी राजपूत ब्राह्मणों की गुलामी कर रहे है। अब तो ये मानसिकता राजपूतों में ऐसे घर कर गई है कि कोई भी राजपूत ब्राह्मणों के खिलाफ आवाज उठाना ही नहीं चाहता।

7. राम अवतार:

1-पूरा रामायण एक काल्पनिक कहानी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ना तो राम मर्यादा पुरषोंतम था और ना ही रावण की लंका समुद्र पार थी। राम का जन्म एक यज्ञ के माध्यम से हुआ था। यज्ञ की सचाई आप हमारी दूसरी पोस्ट पर भी पढ़ सकते हो। उस समय दशरथ की उम्र 60 साल की हो चुकी थी और दशरथ बच्चे पैदा करने में असमर्थ था। तो दशरथ ने अपनी पत्नियाँ ब्राह्मणों को दे कर बच्चे पैदा करने की योजना बनाई। तो पुरे देश से ब्राह्मण बुलाये गए,

2-अभी ब्राह्मणों में से तीन ब्राह्मण चुने गए। और उनको दशरथ ने अपनी तीनों रानियाँ सम्भोग करने को दी। इस विधि को उस समय “नियोग विधि” कहा जाता था। तीनों ब्राह्मणों ने दशरथ की तीनों रानियों के साथ कई दिनों तक शारीरिक सम्बन्ध बनाये और उसके परिणाम स्वरूप राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न नाम के चार पुत्र दशरथ को प्राप्त हुए। पाठकगण खुद सोच सकते है ऐसे घटिया कृत्य से प्राप्त राम भगवान् कैसे हो सकता है। राम बहुत गिरा हुआ और नीच आदमी था। यह बात आपको विस्तार से “सची रामायण” से पता चल सकती है। “सची रामायण” सभी पाठकगण ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड कर सकते है और पढ़ सकते है।

3- सची रामायण सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रमाणित किताब है। बाद में ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्टता साबित करने के लिए राम को भी भगवान् बना दिया। और इतना ज्यादा प्रचारित किया कि देश का हर आदमी आज राम को भगवान् की तरह पूजता है।

8. कृष्ण अवतार:

1- कृष्णा अवतार के तो कहने ही क्या। दुनिया का सबसे बड़ा ढोंग कृष्ण को भगवान् प्रचारित करने को बोला जा सकता है। उस कृष्ण को भगवान् बना दिया, जो गाँव की लड़कियों और औरतों को नंगे नहाते हुए देखता था। जिस के नन्द गाँव की हर औरत के साथ शारीरिक सम्बन्ध थे। कृष्ण के शारीरिक सम्बन्ध कुवारी और विवाहित दोनों स्त्रियों के साथ थे। इस विषय पर लगभग सारा साहित्य एक मत है।

2-कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:

‘ ता: वार्यमाणा: पतिभि: पितृभि्भ्रातृभिस्तथा,

कृष्ण गोपांगना रात्रौं रमयंती रतिप्रिया :’ -विष्णुपुराण, 5, 13/59.

अर्थात वे रतिप्रिय गोपियाँ अपने पतियों, पिताओं और भाइयो के रोकने पर भि रात में कृष्ण के साथ रमण करती थी . कृष्ण और गोपियों का अनुचित सम्बन्ध था यह बात भागवत में स्पष्ट रूप से मोजूद हैं, ईश्वर अथवा उस के अवतार माने जाने वाले कृष्ण का जन सामान्य के समक्ष अपने ही गाँव की बहु बेटियों के साथ सम्बन्ध रखना क्या आदर्श था?

3-कृष्ण ने गोपियों के साथ साथ ठंडी बालू वाले नदी पुलिन पर प्रवेश कर के रमण किया. वह स्थान कुमुद की चंचल और सुगन्धित वायु आनंददायक बन रहा था. बाहे फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ दबाना, बाल (चोटी) खींचना, जंघाओं पर हाथ फेरना, नीवी एवं स्तनों को चुन, गोपियों के नर्म अंगो नाखुनो से नोचना, तिरछी निगाह से देखना, हंसीमजाक करना आदि क्रियाओं से गोपियों में कामवासना बढ़ाते हुए कृष्ण ने रमण किया. – श्रीमदभागवत महापुराण 10/29/45

कृष्ण ने रात रात भर जाग कर अपने साथियो सहित अपने से अधिक अवस्था वाली और माता जैसे दिखने वाली गोपियों को भोगा. – आनंद रामायण, राज्य सर्ग 3/47

4-कृष्ण के विषय में जो कुछ आगे पुरानो में लिखा हैं उसे लिखते हुए भी शर्म महसूस होती हैं की गोपियों के साथ उसने क्या-क्या किया इसलिए में निचे अब सिर्फ हवाले लिख रहा हूँ जहा कृष्ण ने गोपियों के यौन क्रियाये की हैं –

– ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय

28-6/18, 74, 75, 77, 85, 86, 105, 109,110,

134, 70.

5-कृष्ण का सम्बन्ध अनेक नारियों से रहा हैं कृष्ण की विवाहिता पत्नियों की संख्या सोलह हज़ार एक सो आठ बताई जाती हैं. धार्मिक क्षेत्र में कृष्ण के साथ राधा का नाम ही अधिक प्रचलित हैं. कृष्ण की मूर्ति के साथ प्राय: सभी मंदिरों में राधा की मूर्ति हैं. लेकिन आखिर ये राधा थी कौन? ब्रह्मावैवर्त पुराण राधा कृष्ण की मामी बताई गयी हैं. इसी पुराण में राधा की उत्पत्ति कृष्ण के बाए अंग से बताई गयी हैं ‘कृष्ण के बायें भाग से एक कन्या उत्पन्न हुई. गुडवानो ने उसका नाम राधा रखा.’

– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 5/25-26

6-‘उस राधा का विवाह रायाण नामक वैश्य के साथ कर दिया गया कृष्ण की जो माता यशोदा थी रायाण उनका सगा भाई था.

– ब्रह्मावैवर्त पुराण, 49/39,41,49

7-यदि राधा को कृष्ण के अंग से उत्पन्न माने तो वह उसकी पुत्री हुई . यदि यशोदा के नाते विचार करें तो वह कृष्ण की मामी हुई. दोनों ही दृष्टियो से राधा का कृष्ण के साथ प्रेम अनुचित था और कृष्ण ने अनेको बार राधा के साथ सम्भोग किया था ( ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, अध्याय 15) और यहाँ तक विवाह भी कर लिया था (ब्रह्मावैवर्त पुराण, कृष्णजन्म खंड 4, 115/86-88).

8-इन सभी बातों पर अगर गौर किया जाये तो आप पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि कृष्ण भगवान् कहलाने का कितना अधिकारी है? भागवत गीता के बारे जो कथा प्रचलित है वो भी मात्र झूठ ही है। भागवत गीता भी मूल निवासियों को धर्म की गुलामी में फंसाए रखने का एक षड्यंत्र मात्र है। जो एक आर्य ऋषि व्यास ने लिखा था जिस में अच्छी बातें सिर्फ इस लिए लिखी गई ताकि मूल निवासी शक ना करे और ब्राह्मणों के धर्म जाल में फंसे रहे।

9-महाभारत के नाम पर भी मूल निवासियों को सिर्फ झूठ ही बताया गया है। ना कभी महाभारत का युद्ध हुआ और ना ही गीता युद्ध में कृष्ण ने बोली। यह तो कृष्ण को भगवान् को साबित करने का एक षड्यंत्र मात्र है।

9. बुद्ध अवतार:

1- इस अवतार के बारे तो सारी दुनिया जानती है। बुद्ध काल तक सारे भगवान् और अवतार बलि के नाम पर मांस और खून के प्यासे थे, वो बुद्ध जैसे महान कैसे हो सकते है? बुद्ध शाक्य वंश में पैदा हुआ एक महान मानव था,(शाक्य वंश के बारे विस्तृत जानकारी आप को हमारे आने वाले लेखों में मिलेगी) जिसने ब्राह्मणों के विरुद्ध मूल निवासियों का एक धर्म बनाया और सभी मूल निवासियों को इकठ्ठा किया। मूल निवासियों का यह धर्म बौद्ध धर्म के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सिद्धार्थ बुद्ध के समय इस धर्म में कोई जाति व्यवस्था नहीं थी। सभी लोग एक सम्मान थे। कोई उंच-नीच नहीं थी। यहाँ तक सिद्धार्थ बुद्ध खुद भी जमीन पर बैठ कर प्रवचन दिया करते थे।

2- यह धर्म कितना महान था इस बात का पता यही से लग जाता है कि 500 ईसवी से 700 ईसवी के बीच बौद्ध धर्म भारत का सर्व श्रेष्ट धर्म बन चूका था। ब्राह्मणों का वर्चस्व समाप्त सा हो गया था। भारत में सभी लोग उंच-नीच, जाति-पाति भूलाकर सिर्फ इंसान बनकर रहने लगे थे। कोई भी मूल निवासी ब्राह्मणों को महत्व नहीं देता था और सारे मूल निवासी फिर से रूद्र काल के गौरव को प्राप्त करने के गौरव की और बढ़ रहे थे। इस बात से यूरेशियन आर्यों अर्थात ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा परेशानी हुई। बौद्ध धर्म को समाप्त करने के लिए फिर से सारे ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य एक हुए और उन्होंने एक चाल चली। बहुत से ब्राह्मण बौद्ध भिक्षु बन गए।

3-बौद्ध धर्म के मत्वपूर्ण टिकानों पर ब्राह्मण बौद्ध भिक्षुयों ने कब्ज़ा कर लिया और राजपूतों ने बौद्ध भिक्षुयों के मठों पर आक्रमण कर दिया। लाखों बौद्ध भिक्षु मारे गए, बौद्ध भिक्षुयों के लिखे ग्रंथ और किताबें जला दी गई। बौद्ध धर्म को पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया। जो बौद्ध भिक्षु बचे वो अपने प्राणों की रक्षा के लिए भाग गए और जंगलों और पहाड़ों में चुप गए। आज फिर से बौद्ध धर्म लोगों के बीच प्रचलित हो रहा है परन्तु आज बौद्ध धर्म में भी उंच-नीच आ गई है। हीनयान ऊँचे माने जाते है और बाकि दोनों संप्रदाय नीच माने जाते है।

4-अब पाठकगण खुद ही समझ सकते है कि महात्मा बुद्ध विष्णु का अवतार कैसे हो सकते है? जिन द्विजो,राजपूतों और वैश्यों ने बुद्ध धर्म का नाश कर दिया, आज उन्ही यूरेशियन आर्यों को शर्म तक नहीं आती।

Rajesh kushwaha nijampur pali

सवायजपुर विधानसभा के भरखनी तृतीय से जिला पंचायत पद हेतु समाजवादीz पार्टी से आवेदन करते बड़े भाई राजेश कुशवाहा जी

पोस्टेड -: शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी ।

समर्थक राजेश कुशवाहा (नमो बुद्धाय ट्रेडर्स )

Doctor bheemrav Ambedkar

बाबा साहेब खूब अच्छी प्रकार जानते थे कि संविधान की मसौदा कमेटी के दूसरे
सदस्य के० एम० मुन्शी, इलादी कृष्णा स्वामी आदि ने कभी मसौदे पर विचार करने के
कष्ट ही नहीं किया। यह लोग अपने निजी कामों में मस्त रहते थे और नाम मात्र के
सदस्य थे। वास्तव में संविधान का सारा मसौदा तैयार करने तथा उसे असैम्बली में पेश
करने और संविधान सभा के सदस्यों के साथ बहस करने का काम केवल मात्र बाबा
साहेब पर ही निर्भर रहता था। इस सम्बन्ध में संविधान मसौदा कमेटी के एक प्रमुख
सदस्य दिवंगत श्री टी०टी० कृष्णमाचारी ने साफ शब्दों में जाहिर कर दिया था कि
कहने मात्र के लिए संविधान मसौदा कमेटी के सात सदस्य थे किन्तु सच्चाई यह है कि
जोखिम और परिश्रम तथा बुद्धिमत्ता का सारा काम अकेले बाबा साहेब ने ही किया
था । टी०टी० कृष्णामचारी द्वारा इस बारे में कहे शब्दों का हिन्दी अनुवाद गवाही के
तौर पर प्रस्तुत किया जाता है, जो कि यूँ है :
यद्यपि भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए सात सदस्यों की
एक कमेटी बनाई गई थी किन्तु उनमें से एक ने इस्तीफा दे दिया था और उसकेस्थान पर दूसरा नामजद किया गया था लेकिन वह मैम्बर मर गया था। फिर
उसका स्थान खाली ही रहा। बाकी मैम्बरों में एक सरकारी कामों में ही व्यस्त
रहा। दीर्घरोगी होने के कारण दो मैम्बर देहली से सदा दूर रहे।

परिणामतः यह कि बड़ी भारी जिम्मेदारी का काम अर्थात् संविधान के
मसौदे को तैयार करने का काम अकेले डाक्टर अम्बेडकर के कन्धों पर आ पड़ा,
जिसे उन्होंने प्रशंसनीय ढंग से पूरा किया।

विधि मन्त्री को हैसीयत से संविधान समिति के अध्यक्ष भी वही थे। हाँ, एक बार
चलती गाड़ी में रोड़ा अटकाने के लिए के० एम० मुन्शी ने बाबा साहेब को कहा कि
सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित आदिम जातियों के लिए
आरक्षण (रिजर्वेशन) के लिए संविधान में प्रबन्ध करने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा
करने पर मुसलमान, सिक्ख तथा पारसी, ईसाई आदि भी अपने-अपने संख्या अनुपात
अनुसार नौकरियाँ एवं शिक्षा सम्बन्धी सुविधा सहूलियत मांगेंगे। इस प्रकार हिन्दुओं का
नौकरी में अनुपात बहुत कम रह जाएगा और साम्प्रदायिकता का विष बराबर बढ़ता
रहेगा। बाबा साहेब बोले मिस्टर मुंशी, तुम तीस चालीस रुपए से कम कीमती धोती
नहीं पहनते। तुम्हारी धोतो पर थोड़ा बहुत धब्बा लगता है तो उसे परे फैंक कर नई
बदल लेते हो। तुम्हें इन निरीह अतों और आदिम जातियों को बेबसी, दरिद्रता और
अशिक्षा का क्या ज्ञान हो सकता है? हिंदुओं ने आज तक इन्हें सब अधिकारों से वंचित
रखा है। इनके हर प्रकार के अधिकार सवर्ण हिंदू आज तक डीनते आ रहे हैं। यह दोनों
अनुसूचित जातियां और कुछ पिछड़े वर्ग भी स्वाधीन भारत में अपना छिना अधिकार
प्राप्त करने के पात्र हैं। भारतीय मुस्लिमों, ईसाइयों, पारसियों, सिक्खों से इनका
मुकाबला करना मूर्खता है। वे सब जातियाँ, सुशिक्षित और धनाढ्य है। इनका आरक्षण
पर किसी प्रकार का क्लेम नहीं बनता। यह खुले मुकाबले में सवर्ण हिंदुओं से पीछे
नहीं रहेंगे जबकि इन अनुसूचित जातियों की तो रोड़ की हड्डी हो तोड़ डाली गई है।
त्री के० एम० मुन्शी ने कहा मुझे सरदार पटेल ने यह आदेश दिया है। बाबा साहेब
बोले तो पटेल से कहिए कि वह स्वयं संविधान के मसौदे का काम संभाल ले, मैं
छुट्टी करता हूँ। मैंने संविधान सभा में अल्प-जातियों की मांगों पर जो धारणा बना
रखी थी। गांधी जी और जवाहरलाल ने उसे संविधान में शामिल करने का मेरे साथ
वायदा कर रखा है। यदि मेरी यह इच्छा पूरी नहीं होने दी जाएगी तो मैं संविधान
मसौदा कमेटी की अध्यक्षता एवं विधि मन्त्रालय के मन्त्री पद को भी त्याग दूंगा। यह
सारी घटना बाबा साहेब ने हमें अपने प्रतिदिन होने वाली एक सायंकालीन बैठक
बतलाई। संभवतः के० एम० मुन्शी ने सरदार पटेल को जो उस समय उप-प्रधान मन्त्री
थे, और के० एम० मुन्शी की भांति कट्टर गुजराती सनातनधर्मो हिन्दू भी थे उनको भी
बतला दी होगी।

सरदार पटेल की हिम्मत नहीं थी कि वह बाबा साहेब से संविधान मसौदा कमेटी
छीन सकते क्योंकि कोई भी दूसरा कांग्रेसी महारथी इस जोखिम तथा योग्यता के काम
को सम्पूर्ण करने के लिए आगे नहीं आ सकता था। सुना था कि पटेल ने मुन्शी से कहा
कि संविधान में रिजर्वेशन होने से क्या होगा ? गृह मन्त्रालय इन अनुसूचित जातियों को
में आरक्षण नहीं देगा। केवल कुछ क्लर्क रिजर्वेशन में नौकरी ले भी गए तो ज्यादा
आई० ए० एस०, आई०एफ० एस० और आई० पी० एस० आदि प्रशासनिक नौकरियाँ
अन्तर नहीं पड़ेगा। यह थी हिन्दू जहनीयित या मनोवृत्ति लौहपुरुष सरदार पटेल की
और हिन्दू संस्कृति के धर्मध्वजी तथा ध्वस्त सोमनाथ मन्दिर को सोलहवीं बार सरकारी
कोष से लाखों रुपया बर्बाद करके इस मन्दिर का पुनर्निमाण कराने वाले बड़े अभिमान
से अपने आपको जाम्दाग्नेय ब्राह्मण कहलाने वाले आर्य ब्राह्मण के० एम० मुन्शी की।
पुराणों की कथनानुसार जमदाग्नेय जिसका वंश कहलाने के मुन्शी को घमण्ड था,
उसने अपनी सगी माता का वध या कत्ल कर दिया था।
इन तथ्यों से भलीभान्ति सावित हो जाता है कि बाबा साहेब का जवाहरलाल या
काँग्रेसी मन्त्रीमण्डल में शामिल होना केवल अछूतों और आदिम जातियों एवं पिछड़े
वर्गों को हजारों वर्षों से अधोगति के अंधेरे गर्त से निकालना ही अभीष्ट था। उन्हें उठते
बैठते, जागते सोते, पढ़ते और साधारण बातचीत करते हर समय इन्हीं दुर्बल तथा
पिछड़े वर्गों के कल्याण का ख्याल रहता था। बाबा साहेब को एक बात का बहुत ही
अफसोस एवं हार्दिक खेद रहा कि भारत के पिछड़े वर्गों जिन्हें हिन्दूओं ने शूद्र घोषित
कर रखा है, उन्होंने बाबा साहेब की नीति पर चलना स्वीकार नहीं किया। यदि
भारतवर्ष के कुम्हार, तेली, तम्बोली, नाई, तरखान, कहार, धीवर, मल्लाह, लोधे, छीपे,
माछी, ग्वाले आदि अनेक अछूत शुद्र जातियाँ भी उनका साथ देतीं तो भारत के प्रशासन
के स्वामी ब्राह्मण आदि सवर्ण जातियों के लोग न होकर यही अछूत तथा सछूत शूद्र
जिन्हें बैकवर्ड (पिछड़ा वर्ग) कहा जाता है, भारत के सारे प्रशासन को संभालते किन्तु
यह अछूत शूद्र तो अपने आपको सवर्ण कहलाने में ही अपना कल्याण समझते रहे और
समझ रहे हैं और यह ठाकुर, ब्राह्मण बनने के लिए आतुर हैं। एक दुर्घटना जो जनवरी
1948 में गांधीजी की हत्या करने में घटी, उससे सम्बन्धित सूचना को ईवनिंग न्यूज में
मुख्य खबर में छापा गया था मैं शाम को जब अपने दफ्तर से वापस यह समाचार पत्र
लेकर सीधा बाबा साहेब के कमरे में पहुँचा तो वह अपनी रोजमर्रा की आदत के
अनुसार सो रहे थे। कान्स्टीच्यूट असैम्बली से वापस लौटने पर वह सायं छह-सात बजे
एक घण्टा अवश्य सोया करते थे। मैंने ही सबसे पहले बतलाया कि अभी-अभी बिरला
हाऊस में गांधीजी की किसी गोड्से नामक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ने पिस्तौल की गोली
मारकर हत्या कर दी है।
बाबा साहेब यह भयानक खबर जानकर एकदम चुप हो गये और उदासी के चिह्न
स्पष्ट उनकी मुखमुद्रा पर दिखाई दिए। उन्होंने अंग्रेजी में कहा (It is not good to be
too good) इसका अभिप्राय यह है कि अत्यन्त अच्छा होना भी भयप्रद होता है। बाबा
साहेब बोले कि ऐसे काम महाराष्ट्रीय ही कर सकते हैं। मैंने कहा कि आप भी तो
महाराष्ट्रीय ही हैं। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में तीन जातियों का प्रभुत्व है। पढ़े लिखे
ब्राह्मण अपने आपको महाराष्ट्रीय कहलाते हैं, दूसरी अब्राह्मण तथा प्रभावशाली जाति हैजिन्हें मराठा कहा जाता है। शिवानी, महाराजा कोल्हापुर, बढ़ौदा, ग्वालियर और इन्दौर
आदि के वंशज और जमीन जोराने वाले कृषक हैं राथा सेना में उनकी संख्या सबसे
अधिक है। तीसरी महाराष्ट्र की जाति है महार जिनकी संख्या अछूतों में सबसे अधिक,
ब्राहाणा से भी अधिक किन्तु मराठों से कम है। मेरा जन्म भी इसी महार जाति में ही
हुआ है। यह जाति अति दरिद्र, और हर प्रकार से पिछड़ी हुई है किन्तु इनका स्वभाव
सैनिक है। यह ईस्ट इण्डिया कम्पनी में सैनिक थे।
पहार शिवाजी तथा पेशवाओं के समय में भी सैनिक रहे हैं, किन्तु जब अंग्रेजों
को फौजी भर्ती में पराठा मिलने लग पड़े तो इन्हें ईष्ट इण्डिया कम्पनी बहादुर ने सेना
में भर्ती करना बंद कर दिया। महार और मराठा हर एक गाँव में मौजूद हैं। यह गाँव की
चौकीदारी करते हैं और बदले में इन्हें प्रत्येक ग्राम में कुछ भूमि मिली होती है जिसे
चतन कहा जाता है। तुम भले ही मेरा जाति पक्षपात मान लो किन्तु इन गरीब महारों में
ईमानदारी कूट कूट कर भरी होती है। इन महार स्त्रियों की फटी पुरानी धोतियों के
कच्छा में सारे गांव का उगाहा सरकारी लगान का रुपया तहसीलदार के पास सरकारी
खजाने में जमा कराने के लिए छिपा रहता है। किन्तु कई दफा रात भर इन्हें तहसील में
ठहरना पड़ता है, किन्तु यह बिना किसी भय और लालच के रात भर नंगी भूमि पर
सोकर दूसरे दिन सरकारी मालिया जमा करके घर लौटती थीं। किसी बाहर वाले व्यक्ति
की मजाल नहीं होती थी कि वह किसी भी ग्राम में चौकीदार (महार) की इजाजत के
बिना गांव में प्रविष्ट हो सके। गले से नंगा मैली मोटी धोती लपेटे गांव का महार
चौकीदार या कोतवाल हाथ में तगड़ी मोटी बांस की लाठी रखता था और गांव के हर
नवागत की पूगिच्छ करने के पश्चात् तसल्ली होने पर ही उसे गांव में दाखिल होने
मराठा जमींदारों की किसी भी पंचायत या सभा का आरम्भ महार चौकीदार की
मौजूदगी के बिना सम्पन्न नहीं हो सकता था। सबसे पहले पंचायत के प्रयोजन को
पंचायत में महार चौकीदार बताता तब सभा की कार्यवाही आरम्भ होती थी। अगर
किसी कारणवश महार देर से पंचायत में पहुंचा अथवा न पहुंचा तब उस मराठा
पंचायत की कार्यवाही स्थगित हो जाती। उनके कहने का तात्पर्य यही था कि महाराष्ट्र
देश में मुख्यतः इन तीन जातियों की प्रधानता है। महाराष्ट्रीय अर्थात् ब्राह्मण विद्वान् भी
हैं और उपद्रवकारी भी हैं। विशेषतः चितपावन ब्राहाण जिनके पुरखा पेशवा रहकर राज
कर चुके थे और उनमें बाल गंगाधर तिलक, केलकर, डा० काणे, डा० कार्वे, आग्रकर,
सावरकर, गोखले पंडिता रमाबाई इत्यादि प्रसिद्ध देशभक्त और विद्वान् हो चुके हैं। बाबा
साहेब का कहना था कि गांधी की हत्या सिवाय महाराष्ट्रियों के किसी भी प्रान्त का
कोई भी हिन्दू करने की जुर्रत ( साहस) नहीं कर सकता था।
गाँधी जी की हत्या की प्रतिक्रिया महाराष्ट्र में ही बहुत अधिक हुई। नॉन ब्राह्मण
(मराठी) ने बाबई, पूना, सतारा, कोल्हापुर नगरों तथा ग्रामों में ब्राह्मणों को जान सेमारा और लूटा। उसके पर पूंक दिए, एवं उनकी बहू बेटियों का शील भंग किया।
इस भादाण द्वारा गाधीजी की हत्या का तो महज महाना था। वस्तुत: नॉन ब्राहाणों के
दिलों में प्राहाणों के प्रति जो प्रतिशोध की आग अन्दर ही अन्दर सुलग रही थी, इस
दुर्घटना में यह मक उठी। महाराष्ट्र में सांगली एक ब्राह्मण शासित छोटा सा राज्य
गा । उसको बहुत दुर्गति की गई। ब्राहाणों के घर जलाए गए। उन्हें कई अन्य तरीकों से
उत्पादित किया गया। सांगली राज्य के तथा महाराष्ट्र के अन्य क्षेत्रों के वयोवृद्ध ब्राह्मणों
का एक जल्या बाबा साहेब के पास आया और उनमें से अनेक फूट-फूट कर रोने लगे
कि हमें मराठों ने तबाह कर दिया है।
भाना साहेब ने उनकी आहोजारी या करुणाक्रन्दन सुनकर कहा कि यह जो कुछ
हुआ है मुझे इसको सुनकर अति दुखः हुआ है किन्तु मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता
कि वर्णव्यवस्था तथा जाति पाँति का जो विष वृक्ष तुम्हारे ब्राह्मण पुरखा बो गए हैं, यह
उसी वृक्ष का जहरीला फल है जिसे अब तुम्हें चखना पड़ रहा है। बाबा साहेब ने एक
भादाण नेता को तो सम्बोधित करते हुए कहा कि मैं जब काला राम मन्दिर में प्रवेश
करना चाहता था और महाड़ के तालाब में अपने लोगों को पानी लेने के लिए
आन्दोलन कर रहा था क्या तुमने उस समय बढ़-चढ़कर हमारे इन सत्याग्रहों के
खिलाफ प्रचार नहीं किया था? और मराठा आदि लोगों को मुझे जान से मारने के लिए
नहीं भड़काया था? मैंने तुम्हें उसी समय कहा था कि इन जाति-पाति और ऊँच-नीचता
की दीवारों को हटा दो। सबके साथ समता का व्यवहार करो नहीं तो एक दिन ऐसा भी
आ सकता है जब तुम्हारी भड़काहट में आने वाले यही नॉन ब्राह्मण तुम्हारा सत्यानाश
कर देंगे, कहिए आज मेरी बात सच्ची सिद्ध हुई है कि नहीं। वह वृद्ध ब्राह्मण आँसू
बहाते हुए बोला तुम्हारा सब कहना सत्य था। तुम्हारी भविष्यवाणी सत्य निकली। उन्हीं
दिनों वैदिक स्कॉलर श्रीपाद दामोदर सात्वलेकर का पुस्तकालय जिसमें हजारों ग्रन्थ थे
पूंक दिया गया था और यह भूदा संस्कृत और वैदादि शास्त्रों का स्कॉलर किसी प्रकार
जान बचाकर पार्टी (गुजरात) में शरणार्थी बना और उसने वहाँ अपना शोधकार्य
पूजा के अवसर पर
उन्हीं दिनों गुरु गोल्वालकर भी बाबा साहेब के पास आए थे। उनकी दसों
गलियों में जाना प्रकार की पाषाणजड़ित सुनहरी अंगूठियाँ पहनी हुई मैंने अपनी आँखों
से देखी माँबाबा साहेब ने कहा कि यह कोई धनी व्यक्ति नहीं है किन्तु सोने के
हरेजड़ित यह अंगठियाँ इसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के गुरुदी
दक्षिणा में मिली है। देखिए इस देश के पोप एक नहीं दो नहीं दसों उँगलियों में दसियों
प्रकार की अंगूठियाँ पहने हुए हैं। ऐसे गुरु जिस देश में होंगे उसका कभी कल्याण नहीं
हो सकता। सदाशिव गुरु गोल्चालकर बाबा साहेब से मराठी में बातें करते रहे जिन्हें मैं
बहुत कम ही समझ पाया था क्योंकि मैं मराठी से अनभित था किन्तु बातचीत का
भावार्थ यही गा कि मराठों का मुकाबला करने के लिए मराठा इन सब जातियों का
संगठन होना चाहिए नहीं तो इन्होंने आज ब्राहाणी पर अत्याचार हाया है कल अवा
पर भी अत्याचार करेंगे। मराठों की बहुसंख्या गिनती और भूस्वामित्व बल सब नॉन
मराठों को समाप्त कर देगा। मैं इसका उपाय करने के लिए आपके पास आया है।
बाबा साहेब ने भी गुरु गोल्चालकर से बातचीत पराठी की जिसे मैं भलीभांति
तो न समझ पाया किन्तु बातों बातों में बाबा साहब ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उस
नेता को कहा कि तुम चितपावन ब्राह्मण हो, तुम्हारे पुख्खा पेशवा जिनके हाथ में देश
के प्रशासन की बागडोर रही उनका सलूक हम अछूतों के साथ कैसा था? तुम्हारे
पेशवा महाराजाओं ने भी तो पूना (पेशवा राजधानी) में अछूतों के गले में मिट्टी की
हंडिया बाँधने, कमर पर झाडू बांध कर सड़कों पर चलने का आदेश दे रखा था, ताकि
अछूत थूकें तो उस मिट्टी की हन्डिया में ही थूकें कदाचित उनके थूक से मार्ग प्रष्ट न
हो जाए। और कमर झाड़ बाँधने के आदेश इस कारण दिए ताकि अछूतों के पैरों के
निशान मिटते चले जाएँ और उनके पदचिन्हों पर चलकर कोई सवर्ण हिन्दू विशेषत:
ब्राहाण भ्रष्ट न हो जाएं।
महाराष्ट्र
में जो आग लग रही है और ब्राहाण नारियों की इज्जत लूटी जा रही है,
उनके घर जलाए जा रहे हैं केवल इसलिए क्योंकि गांधीजी के हत्यारे नाथुराम गोडसे
चितपावन जात-बिरादरी के ब्राहाण हैं ? तुम्हारा यह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी तो
ब्राह्मणों का ही एक संगठन है, इसमें न तो महार अछूत हैं और न ही मराठे। अभी तो
अपने पुरखों के पहले बोए विषवृक्ष का फल चख रहे हो, अब तुमने एक और
साम्प्रदायिक विप वृक्ष बोना आरम्भ कर दिया है। इसका भी बहुत बुरा प्रभाव
निकलेगा। तुम संघ बनाते हो तो बनाओ किन्तु जात पात मिटाने, वर्ण-व्यवस्था का नाश
करने के लिए संगठन बनाओ। अब पिछली भूल को सुधारो। ऐसे संगठन पुनः ब्राह्मण
चितपावन राज कायम नहीं कर सकेंगे। यह सब बातें बाबा साहेब ने हमें गुरु
गोलवाल्कर के चले जाने पर हिन्दुस्तानी में बताई थीं।
गुरु गोल्चालकर खामोशी से उनकी बातें सुनता रहा किन्तु किसी भी प्रसंग का
उत्तर दिए बगैर उठकर चला गया। लंका के राजदूत की कोठी बाबा साहेब की कोठी
के साथ सटी हुई कोठी नम्बर 3 हागि एवेन्यु में थी। एक रात वहां के हाई कमिश्नर
ने लंका की स्वाधीनता दिवस के उपलक्ष में एक बहुत बड़ी दावत थी। उस दावत में
सैकड़ों संभ्रान्त व्यक्ति तथा नाना देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। लार्डमाउंटबेटन
(भारतीय गवर्नर जनरल) और भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल भी उस महोत्सव में
सम्मिलित थे। हम हैरान परेशान थे कि कोठी के साथ कोठी जुड़ी हुई है तो फिर बाबा
साहेब इसमें ययों सम्मिलित नहीं हुए। रात के दस ग्यारह बजे तक जाम से जाम
टकराते रहे। हम बाबा साहब की कोठी में रहने वाले सब लोग अपनी आंखों से यह
तमाशा देख रहे थे। मैं दस साढ़े दस बजे रात बाबा साहेब के कमरे में दाखिल हुआ
तो
वह अपने टेबुल पर कुछ लिखने में व्यस्त दिखाई पड़े। अकस्मात् उनकी दृष्टि ऊपर
उठी तो मुझसे बोले आओ क्या बात है ? मैंने झट पूछ लिया कि बाबा साहेब आज
लंका हाई कमिश्नर महोत्सव मना रहा है। कारों की लम्बी लाइन इण्डिया गेट तक
पहुँच चुकी है। प्रधानमंत्री जवाहरलाल और माउंटबेटन भी उसमें शरीक हैं आपको
निमन्त्रण नहीं मिला क्या?
बाबा साहेब बोले मुझे शायद सबसे पहले निमन्त्रण मिला होगा किन्तु मैं ऐसे
उत्सवों में अपना कीमती समय नष्ट करने के पक्ष में नहीं हूँ।
मैं इस समय “अछूत कौन और कैसे” (Who were the untouchables) लिख
रहा हूँ। मैंने बाबा साहेब से कहा कि जवाहरलाल ने उस महोत्सव में अपना भाषण भी
दिया है और लंका वालों को सम्बोधित करते हुए कहा है कि हम भारतीय और
तुम
लंका निवासी एक ही बोधिवृक्ष की जड़ें और शाखाएँ हैं। हमारा तुम्हारा सम्बन्ध
सांस्कृतिक तौर पर समान ही है। भारत के बोधिवृक्ष की एक शाखा बोध गया से जाकर
संघमित्रा और महेन्द्र ने लंका में रोपी थीं जो आज एक पूरे वृक्ष के रूप में तुम्हारी
धरती में दो हजार वर्षों से विद्यमान है। बाबा साहेब ने मजाक में कहा कि जवाहरलाल
बोधिवृक्ष की शाखा की तो बातें करता है किन्तु यह क्यों नहीं बतलाता कि उस
बोधिवृक्ष को हम (ब्राह्मणों) ने जड़ों समेत इस भूमि से उखाड़ फेंका है। बाबा साहेब
ने कहा हिन्दू बहुत पाखंडी व धूर्त है। जिस बात को कहने से उसे लाभ या यश मिलता
हो, उसका सम्बन्ध अपने देश या संस्कृति से जोड़ लेता है। हिन्दू समन्वयवादी भानुमति
का पिटारा है। दूसरों की हर अच्छी बात को अपने धर्म और संस्कृति से जोड़ना और
अपने धर्म को सच्चाई की जड़ बताना और सिद्ध करना इनका सदा से ही काम रहा है।
बाबा साहेब ने बातों-बातों में जिक्र किया कि भारत का राष्ट्रध्वज क्या होना चाहिए?
इस पर कई हिन्दुओं ने केसरी ध्वज बताया। किसी ने ओउम् का झण्डा अपनाने के
लिए सुझाव दिया। महाराष्ट्र के हिन्दू क्रान्तिकारी नेता वीर सावरकर ने पीले झण्डे में
तलवार लटकती दिखाने वाले झण्डे का अनुमोदन किया था। बाबा साहेब ने कहा कि
मेरा सुझाव था कि ऐसा राष्ट्रीय झण्डा तथा राष्ट्रीय निशान अपनाया जाए जिसके पीछे
भारत का गौरव और राजनीतिक इतिहास भी हो। इस बात में जवाहरलाल भी मेरे साथ
सहमत थे। राम और कृष्ण भी मूर्तियाँ मन्दिरों में स्थान भले ही प्राप्त कर चुकी हैं।
किन्तु अभी इतिहासकार उनके अस्तित्व के बारे में भी संदिग्ध हैं। उनका कोई झण्डा
नहीं था। बाबा साहेब ने कहा कि भारतीय इतिहास में महाराजा अशोक के प्रशासन को
जो महत्त्व मिल चुका है सारा संसार इस सच्चाई से अवगत है । क्यों न सम्राट अशोक
द्वारा प्रयुक्त अशोक चक्र को राष्ट्रीय ध्वज बनाया जाए।
कई कट्टर हिन्दुओं ने हमारे इस सुझाव का कड़ा विरोध भी किया था। उनका
कहना था कि यह धर्मचक्र बुद्ध धर्म प्रवर्तन का प्रतीक है। वैसे अपना स्वार्थ सिद्ध
करने के लिए हिन्दू भगवान बुद्ध और महाराजा अशोक को क्रमश: अपना नवम
अवतार तथा अशोक को भारतीय इतिहास का अनुपम सम्राट मान लेते हैं किन्तु ऐसे
कट्टरपन्थियों को लज्जा आती थी कि वह भगवान बुद्ध के सच्चे अनुयायी मौर्य वंश
अवतंस प्रियदर्शी सम्राट अशोक के अशोकचक्र को स्वाधीन भारत का राष्ट्रीय ध्वज
बनाएँ।
बाबा साहेब प्रायः कहा करते थे कि राम-कृष्ण की मूतियाँ बनाकर यूरोप अथवा
अमरीका के किसी बाजार में बेचने के लिए रख दो। शाम तक एक भी मूर्ति नहीं
बिकेगी जबकि भगवान बुद्ध की मूतिर्या सारे यूरोप, अमरीका अथवा पूर्व एशिया के
किसी भी बाजार में बेचने के लिए रख दो तो सांयकाल होने तक सब बिक जाएंगी।
राम-कृष्ण की मूर्तियों को भारतीय हिंदू मन्दिरों में बैठा हुआ या खड़ा देख सकते
हैं किन्तु भगवान् बुद्ध और उनका धर्म या जीवनदर्शन संसारभर के विद्वानों को
आकर्षित करता रहेगा।
इतने सुन्दर एवं श्रेष्ठ धर्म को ब्राह्मणों ने केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए
कि वह कहीं पुरोहिताई से (जो एकमात्र उनके पेटपालन का धंधा है) वंचित न हो
जाएँ।
ब्राह्मणों ने आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, अवतारवाद, चातुर्वर्ण आदि का झूठा दुर्ग
(किला) खड़ा करके अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए कितने पाखण्डपूर्ण शास्त्र रचे
और भगवान बुद्ध के तर्कसंगत तथा मनोवैज्ञानिक तथ्यों की तुला पर खरे उतरने वाले
सन्मार्ग बौद्ध दर्शन को और उसके प्रचारकों तथा बौद्ध बिहारों को ध्वस्त करने में ही
अपना कल्याण समझा। कितना घोर अनर्थ किया इन ब्राह्मणों ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के
लिए। बाबा साहेब ने एक दिन मुझसे कहा कि सुना है बाबू जगजीवन राम (जो उस
समय बाबा साहेब के प्रतिस्पर्धी बनकर भारत के कांग्रेसी हरिजन मन्त्री थे) हवाई
जहाज से गिर गये हैं और अब विलिंगडन हस्पताल में टूटी हुई टाँग का इलाज करा
रहा है। उसे मेरे साथ देखने चलिए। मैं उनके साथ कार मे बैठकर उक्त हस्पताल के
नर्सिंग होम में गया। बाबू जगजीवन राम की टांग का आप्रेशन हो चुका था और उनकी
टांग ऊपर सीधी खड़ी करके बाँधी हुई थी। बाबा साहेब ज्यूं ही उसके कमरे में दाखिल
हुए बाबू जी ने बिस्तर पर लेटे-लेटे दोनों हाथ जोड़कर बाबा साहेब को नमस्कार
किया। उस समय उनके कमरे में बूंघट निकाले उनकी पत्नी एक कोने में बैठी थीं और
एक श्रीमती जी जिसका नाम निहाल कौर था और जिसने बाद में पंजाब के एक
बाल्मीकि भाई श्री जसवन्त राय से शादी की थी, अपने हाथ में पंखा पकड़े बाबू जी पर
बैठे मच्छर मक्खियों को उड़ा रही थी।
बाबा साहेब बोले। जगजीवन राम ! “तुम बहुत सौभाग्यशाली व्यक्ति हो जो
हवाई जहाज से गिरकर भी जीवित हो” लोग तो घोड़े और गधे की पीठ पर से गिरकर
भी मर जाते हैं। अब यह तुम्हारा दूसरा पुनर्जन्म ही समझना चाहिए। अब इस जीवन में
तुम्हें अपने दरिद्र और सदियों से दबे-पिसे अछूत लोगों की भलाई का ही काम करना
चाहिए। बाबूजी ने मुस्कराती मुखमुद्रा से कहा “ऐसा ही करूंगा”। बाबा साहेब भली-
भाँति जानते थे कि यह व्यक्ति न केवल उनका व्यक्तिगत विरोधी है बल्कि उनके प्रत्येक
ऐसे सिद्धान्त का भी विरोधी है जो अछूतों के कल्याण के लिए वह अपनाते रहते हैं।
सबको मालूम था कि जगजीवन राम बाबू जैसे साधारण व्यक्ति को कांग्रेस सरकार की
गद्दी केवल एकमात्र बाबा साहेब के विरोध करने पर ही तो मिली थी। किन्तु जहाँ तक
मानवता के शिष्टाचार का सम्बन्ध है बाबा साहेब के हृदय में किसी विरोधी के लिए
भी वैरभाव का लेशमात्र नहीं रहता था। जगजीवन राम बाबू तो आखिरकार हमारा ही
गोश्तपोस्त हैं। भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के फलस्वरूप लगभग तीन लाख
अछूत भी पश्चिमी पंजाब और सिंध आदि प्रान्तों से भारत में शरणार्थी बनकर आए थे।
इन लोगों का व्यवसाय या धंधा आमतौर पर खेत मजदूर और किसान का था। कुछ
लोग जूता बनाने, चमड़ा रंगने और जुलाहों का काम भी करते थे। भंगी मेहतर
पाकिस्तान से नहीं आए थे। उन्हें पाकिस्तान सरकार ने भारत नहीं आने दिया।
हमने बाबा साहेब से निवेदन किया कि पूर्वी पंजाब से पाकिस्तान में चले गए
मुसलमानों ने लाखों एकड़ भूमि यहाँ छोड़ी है। इसी प्रकार पश्चिमी पाकिस्तान में
लाखों एकड़ भूमि हिंदू, सिक्ख जमींदार छोड़ आए हैं।
पाकिस्तान के इलाके की भूमि नहरी थी और बहुत उपजाऊ भी थी। वहाँ रहने
वाले अछूत भी अच्छी-खासी आमदनी पैदा कर लेते थे। ऐसी हालत में आप अपने
मन्त्रीमण्डल में प्रश्न उठाएँ कि पूर्वी पंजाब में मुसलमानों द्वारा छोड़ी गई भूमि का कुछ
भाग शरणार्थी अछूतों को भी दिया जाए। बाबा साहेब ने पं० जवाहरलाल से चार लाख
एकड़ भूमि इधर अछूतों को अलाट करने के लिए कह भी दिया। जवाहरलाल जी ने
उनकी इस माँग को उचित और न्याय-संगत माना और बाबा साहेब से ऐसा ही कर देने
के लिए वायदा भी कर दिया।
इस बारे में पंजाब सरकार से राय देने के लिए सरदार प्रताप सिंह कैरों, जो तब
वहाँ की सरकार में मन्त्री थे, दिल्ली आए और उन्होंने बाबा साहेब की इस माँग का
कड़ा विरोध किया। उन्होंने जवाहरलाल से कहा कि इधर मुसलमानों द्वारा छोड़ी गई
जमीन के हकदार, उधर (पाकिस्तान) से आए हिन्दू-सिक्ख भू-स्वामी या जमींदार ही
हैं। बाबा साहेब ने कहा कि जो जमीन मुसलमान इधर छोड़ गए हैं, उस पर अब केवल
भारत सरकार का अधिकार है। वह परिस्थिति अनुसार भूमि को जैसे बाँटना चाहें बाँट
सकती है। क्या यह जरूरी है कि अछूत ऐसी उथल-पुथल या क्रान्ति में इधर आकर
भी भू-स्वामी हिंदू-सिक्खों के खेतों में ही मजदूर और कम्मी ही बने रहें। चालीस
लाख एकड़ भूमि में से यदि इन अछूतों को चार लाख एकड़ भूमि मिल जाएगी तो
इनका जीवनस्तर भी अच्छा हो जाएगा और ये लोग भू-स्वामियों की दायमी गुलामी
(स्थायी पराधीनता) से छुटकारा भी पा सकेंगे। आखिर स्वतन्त्र भारत में इन अछूत
शरणार्थियों के साथ न्याय करना भारत सरकार का कर्तव्य है, विशेषत: कांग्रेस सरकार
की जिसने आजादी लेने से पहले गरीबों और समाज में पिछड़े वर्गों के उद्धार के लिए
वायदे कर रखे हैं। प्रताप सिंह कैरों एक सिक्ख जाट पंजाबी मंत्री था, उसे बेचारे
उसने उन भू-स्वामियों का केस लड़ने में खूब जोर लगाया। आखिरकार कैरों ने
कम्मीयों की बजाए अपने सिक्ख हिंदू जाट जमीदारों का अधिक ख्याल था। इसलिए
जवाहरलाल को धमकी के रूप में कहा कि यदि आपने चूहड़े-चमारों को मुसलमानों
से छोड़ो सम्पत्ति और जमीन में हिस्सेदार बना दिया तो जाट जींदार अपना गुजारा
चोरी ओर डाके मारकर ही करेंगे क्योंकि उनके पास जमीन तो जोतने-बोने के लिए
होगी नहीं। अत: वह रात को लोगों के घरों की दीवारों को खोदकर ही पेट पालेंगे।
अन्त में घटाते-घटाते चार लाख एकड़ भूमि अछूत शरणार्थियों को देने की बजाए एक
लाख एकड़ भूमि देने का वायदा किया गया। यहाँ देखने की बात यह है कि जाट मन्त्री
अपने जाट भाइयों के अधिकारों के लिए जवाहरलाल जी से कैसे अड़ा रहा जबकि
दूसरी ओर अछूतों का कांग्रेसी मन्त्री बाबू जगजीवन राम जो केवल बाबा साहेब के
विरोध करने के फलस्वरूप ही मन्त्री बना था और जो कांग्रेसी नेताओं का चहेता और
उनको नीति में भारतीय अछूतों का वास्तविक और यथार्थ प्रतिनिधि बना बैठा था। वह
चुपचाप इस नीति युद्ध को अधवा अछूतों के अधिकारों की वकालत के समय जिसको
वकालत केवल बाबा साहेब डा० अम्बेडकर कर रहे थे, मुंह में धुंधनियाँ डाले मौन
रहा । यदि बाबा साहेब के साथ जगजीवन बाबू भी इस मामले में साथ देता तो
सम्भवतः आज पूर्वी पंजाब में चार लाख एकड़ भूमि पर पंजाबी अछूतों के हल चलते
दिखाई पड़ते और वे भी स्वाभिमान से गरदन ऊँचौ करके जाट-जमींदारों को चुनौती
देते कि हम भी तुम्हारी तरह भू-स्वामी हैं. तुम्हारे जरखरीद गुलाम नहीं हैं। उनकी
बहु-बेटियाँ जो जाट जमींदारों के खेतों में मजदूरी करती और घास काटती हुई
बेइज्जती तक करवाती रही; इज्जत और अभिमान से अपने खेतों में काम करती हुई
दृष्टिगोचर होती। बाबा साहेब ने अछूतों की सहानुभूति और कल्याण के लिए कोई भी
अवसर हाथ से नहीं जाने दिया जबकि कांग्रेस के मिय्यां मठू या गंगाराम मन्त्री ने
अछूतों के हितो की वकालत न करके केवल मात्र मन्त्री मण्डल में अपनी गही स्थायी
और सुदृढ़ बनाने के लिए ही प्रयत्न जारी रखे और अपने इस तुच्छ ध्येय या लक्ष्य को
पूरा करने में वह सफल भी रहा। इस बात का पंजाब सरकार के जाट मन्त्रियों को ज्ञान
हो चुका था कि डाक्टर अम्बेडकर अछूतों को जमीन दिलवाने के लिए कमर बस्ता है।
इसलिए पंजाब के सच्चर मन्त्रीमंडल के माल मन्त्री, सिक्खों के हितों के रक्षक,
राजनीति तोड़फोड़ में उस्ताद या दक्ष ज्ञानी करतारसिंह जो कभी मास्टर तारासिंह के
लेफ्टिनेर कहे जाते थे, एक दिन बाबा साहेब की कोठी में उनसे मुलाकात करने के
लिए आये। उनकी दो मांगे थी। पहली यह कि अनुसूचित जातियों में सिक्ख अनुसूचित
जातियों, (रामदासिया, कबीरपन्थी, रेहतिया, मजहबी और सिक्लीगरों) को भी अनुसूची
में शामिल कर लिया जाए और दूसरी बात थी कि यदि बाबा साहेब भारत सरकार से
दस बारह लाख रुपया पंजाब सरकार को जमीन के सुधार के लिए ले दें तो हम उस
जमीन को खेती योग्य बनाकर अछूतों और बेजमीन किसानों में बाँट देंगे। बाबा साहेब
ने उत्तर दिया कि मुझे सिक्ख-हरिजनों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने पर कोई
आपत्ति नहीं किन्तु मुझे अत्यन्त दुःख से कहना पड़ता है कि सिक्खों में भी आज तक
हरिजन (अछूत) हैं। गोलमेज कान्फ्रेन्स में तो सिक्ख प्रतिनिधि सरदार उज्जवलसिंह ने
ऊँचे स्वर में कहा था कि न तो सिक्ख धर्म ग्रन्थ में और न ही क्रियात्मक रूप में
सिक्ख समुदाय में जातपांत और छुआछूत का व्यवहार होता है। यदि ऐसा नहीं है तो
सिक्खों में हरिजनों का होना क्या लज्जा की बात नहीं है ?
ज्ञानी जी ने कहा कि हिंदू धर्म के छुआछूत और ऊँच नीचता के कुप्राव हो हम
मिटा नहीं सके यद्यपि हमारे धर्म में जात-पांत और वर्ण-व्यवस्था को कोई स्थान प्राप्त
नहीं है।
बाबा साहेब बोले कि मैं भारत सरकार पर जोर डालूंगा कि वह पंजाव की बंजर
भूमि के सुधार के लिए रुपया दे किन्तु वह जमीन केवल हरिजनों या अछूतों को ही
अलॉट की जाएगी। पंजाब सरकार इस बात की गारंटी दे तो मैं भारत सरकार को रुपया
देने के लिए अवश्य कोशिश करूंगा। यह बातचीत मेरे सामने मेरी मौजूदगी में हुई
क्योंकि ज्ञानी जी बीच-बीच में खालिस पंजाबी बोली में ही बात करते थे जिसका
अनुवाद मैं करता जाता था। बातों-बातों में बाबा साहेब ने कहा ज्ञानी जी ! आप भी
जाट हैं ? ज्ञानी जी बोले सिक्ख धर्म जातपाँत को नहीं मानता। मैं केवल गुरु का सिंह
या सिक्ख ही हूँ। मैं बीच में बोल उठा ज्ञानी जी पक्के सिक्ख हैं किन्तु जाति से जाट
ही हैं। सिक्खों में भी हिन्दुओं जैसी ही जातपाँत है। इस बारे में हिन्दू और सिक्ख
“जैसा भूतनाथ वैसा प्रेतनाथ’ है।
बाबा साहेब बोले कि यह सच्ची बात है अगर सिक्खों में जातपांत न होती तो
सिक्ख नेता हरिजनों को अनुसूचित जातियों में सम्मिलित कराने के लिए क्यों जोर
देते? ज्ञानी करतारसिंह जी के सामने ही मैंने कहा कि बाबा साहेब पंजाब में खास तौर
पर जाट सिक्ख जो पाकिस्तान से आए हैं अछूतों की लड़कियों को जबरदस्ती भगाकर
ले जा रहे हैं। आपके पास भी ऐसी अनेक दर्दभरी चिट्ठियाँ आती रहती है। ज्ञानी
करतारसिंह ने फौरन उत्तर दिया कि हरिजनों की लड़कियों को भगाने की क्या बात है?
जाट तो गरीब और असहाय जाट की भी लड़की भगाने में पीछे नहीं रहता।
बाबा साहेब ने अच्छे वकील की तरह जिरह की ओर फौरन ज्ञानी जी को कहा
कि इसका मतलब यह हुआ कि जाटों ने भले ही सिक्ख धर्म को स्वीकार कर लिया है
किन्तु अपनी कबीला मनोवृत्ति (Tribal mentality) को अभी तक नहीं त्यागा। उन्हें
अभी तक सिक्ख धर्म पर हार्दिक विश्वास नहीं हुआ। ज्ञानी जी ! आपके बारे में मैंने
सुन रखा है कि आप सिक्ख-समाज का मस्तिष्क कहे जाते हैं किन्तु न तो आप सिक्ख
जाटों की लूटपाट और दूसरों की बहू-बेटियों को भगा ले जाने की मनोवृत्ति को बदलने
में सफल हुए हैं और न ही सिक्ख समाज से हिंदुओं जैसी छुआछूत जातपात और
ऊंच-नीचता को दूर कर सके हैं फिर आप कैसे ज्ञानी और सिक्खों का मस्तिष्क कहे
जाते हैं?
ज्ञानी जी ने एक तीसरी बात भी कही कि मैं सरदार पटेल को पृथ्वीसिंह आजाद
पंजाब सरकार के हरिजन मन्त्री की काली करतूतें बताने आया हूँ। उसने आबकारी
मन्त्री के नाते लाखों रुपयों की घूस ली है। मैं उसका सबूत दूंगा कि ऐसा भ्रष्टाचारी
व्यक्ति मन्त्री पद पर नहीं रहना चाहिए। मैं झट बोल उठा कि ज्ञानी जी आप और मैं
दोनों पश्चिमी पंजाब के जिला लायलपुर की तहसील समुन्दरी के रहने वाले हैं। सुना
है कि आपने जब सांझे पंजाब की असैम्बली का चुनाव लड़ा था तो आपने सरदार
बलदेव सिंह पंजाब सरकार के सप्लाई मन्त्री से एक लाख बोरी चनों का परमिट लिया
था और प्रति बोरी दो रुपया लाभ उठाकर दो लाख रुपया रातों-रात बनाकर चुनाव
लड़ा था, ऐसी लायलपुर में आम चर्चा थी। क्या यह बात सच्ची नहीं है? ज्ञानी जी ने
कहा बाप की जमीन में पाँच एकड़ भूमि का हिस्सेदार गरीब आदमी चुनाव के खर्च
को कैसे पूरा कर सकता था। यह रिश्वत नहीं है? मैंने कहा कि अगर पृथ्वीसिंह जैसे
गरीब हरीजन ने अगला चुनाव लड़ने के लिए कुछ रुपया बना लिया तो क्या अपराध
किया है? जो सरदार पटेल को शिकायत करने आए हो।
ज्ञानी जी मेरी इस कड़वी सच्चाई से जरा तड़प उठे और झट बोले कि तुम तो
पृथ्वीसिंह के रिश्तेदार मालूम पड़ते हो। मैंने ज्ञानी जी से कहा कि पृथ्वीसिंह आजाद
को मैं एक आँख नहीं भाता और मेरा उसके साथ कोई सम्बन्ध भी नहीं है।
वह और जगजीवन बाबू कांग्रेस के गंगाराम या मिय्यांमिटू हैं। जो हमेशा हिन्दुओं
का गुणगान करते हैं और बाबा साहेब अम्बेडकर के मिशन के अत्यन्त विरोधी हैं। इन
दोनों को इस समय केन्द्रीय सरकार में बाबू जगजीवन राम को और पंजाब सरकार में
पृथ्वीसिंह को जो कुर्सी नसीब हुई है केवल बाबा साहेब अम्बेडकर के विरोध का ही
इनाम है। मैं तो बाबा साहेब का एक तुच्छ सिपाही हूँ। मुझे उनसे किसी प्रकार का भी
वास्ता नहीं है, किन्तु बात असूल या सिद्धान्त की है। यदि पृथ्वीसिंह ने घूस या रिश्वत
ली है तो आपने भी तो दो लाख रुपया का परमिट बेचने में लगभग वही काम किया है
इसे भी घूस या रिश्वत का माल कहा जा सकता है।
ज्ञानी जी ने बाबा साहेब से विदाई ली और अपनी कार में जा बैठे। मैंने पूछा
ज्ञानीजी अब आप कहां जा रहे हैं ? ज्ञानी जी ने कहा क्या आपको भी कहीं बाहर जाना
है ? मैंने कहा कि हां मुझे अजमेरी गेट तक किसी निजी काम के लिए जाना है।
ज्ञानी जी ने मुझे अपने साथ कार में बिठा लिया और रास्ते में बड़े प्रेमपूर्वक कहा
कि कभी पंजाब आइए। मैंने कहा कि ज्ञानी जी मैं तो दिल्ली में सराकारी नौकरी करता
हूँ। पंजाब आना जाना बहुत कम ही होता है। हां, मेरे भाई और माता-पिता पाकिस्तान
से आकर लुधियाना में ही टिक गए हैं।

ज्ञानी जी से मैंने रास्ते में पूछा कि आप तो मास्टर तारासिंह जी के लैंपटीनेन्ट थे।
वह जब आन्दोलन करके जेल में गए तो आपने उनका साथ क्यों नहीं दिया? वह
बेचारे चन्द अनुयाइयों के सिवाए बाकी सिक्खों की अधिक संख्या को अपने साथ जेल
में न ले जा सके। आपने भी तो उनका साथ नहीं दिया। ज्ञानी जी ने कहा कि मास्टर
तारासिंह हिंदुओं का कट्टर विरोधी है। मैं इस नीति में विश्वास नहीं रखता। उनसे
मेरा यही मतभेद है। मास्टर जी के अनुयायी तो खत्तरी अरोड़ा (भापे) सिक्ख ही हैं।
जो अपनी दुकानदारी को एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकते और जेल की सखी
को सहन नहीं कर सकते। केवल जाट सिक्ख ही ऐसे हैं जो जेलें भर सकते हैं। लड़
मर सकते हैं। वह सब हमारे साथ हैं भला वह मास्टर जी की लीडरी को क्यों मानने
लगे? मैंने हंसी मजाक में ज्ञानी जी से कह दिया कि जाट सिक्खों ने गुरु गोबिन्दसिंह
जी महाराज को भी एक बार कह दिया था, “हम आपका साथ नहीं दे सकते क्योंकि
अब न तो लूटमार में कुछ हाथ आता है, और न ही आपसे तखवाह मिलती है,
इसलिए हम आपका अब साथ नहीं दे सकते।”
ज्ञानी जी भी मुस्करा दिये और मुझे कहा कि तुम सौभाग्यशाली हो जो डाक्टर
अम्बेडकर की संगत में रहते हो। पंजाबी होने के नाते पंजाब सरकार और जाटों के
विरोधी प्रचार में सहायक न बनो। ज्ञानी जी ने कार से उतारते मुझे फिर पंजाब आने
और वहाँ उनसे मिलने की दावत दी। मैंने कहा कि कभी अवसर मिला तो पंजाब में आपके दर्शन जरूर करूँगा।

” बाबासाहेब डॉक्टर अंबेडकर के संपर्क में 25 वर्ष!”

” लेखक- सोहन लाल शास्त्री विद्यावाचस्पति!”🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

नमो बुद्धाय 🙏🙏🙏
जय भीम 🙏🙏🙏
भवतु सब्ब् मंगलम् 🙏
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏🙏

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