शाक्य विजय सिंह रूपापुर सिद्धार्थ एकेडमी विद्यालय

महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की जयंती के उपलक्ष्य में 11 अप्रैल 2019 को लखनऊ में अखिल भारतीय कुशवाहा महासभा के तत्वाधान में प्रस्तावित कार्यक्रम में 50000 स्वजातीय बंधुओं के एकत्र होने का कार्यक्रम प्रस्तावित है।इस संबंध में हरदोई,फर्रुखाबाद,एटा, इटावा,औरैया,मैनपुरी, फिरोजाबाद,सम्भल,बदायूँ आदि जनपदों की भागीदारी से संबंधित जनपद स्तरीय बैठकों का आयोजन शीघ्र आवश्यक है।

संबंधित जनपदों के सम्मानित स्वजातीय बंधुओं से विनम्र निवेदन है कि अपने अपने जनपदों में बैठक के समय निर्धारण के लिए अपनी मूल्यवान सलाह प्रदान करें।

आपका

शाक्य विजय सिंह

केंद्रीय सचिव

अखिल भारतीय कुशवाहा महासभा

त्रेता युग की सच्चाई !

अंधविश्वास ने भारत का सत्यानाश कर दिया।।

नल-नील ने पत्थर पर राम-नाम लिखा और समुद्र में तैरा दिया ….

तो जब हनुमान अपना शरीर इतना बड़ा कर सकता था कि वह पृथ्वी से 110 गुने बड़े सूर्य को फल समझकर निगल गया था तो राम का नाम लिखकर पत्थर पर तैराने की आवश्यकता इतनी मेहनत करने की जरूरत क्या थी ????..

और फिर राम हुये त्रेता युग में यानि त्रेता युग आज से कितने वर्ष पहले था ये देखें पहले आप कि कलियुग के 4320000 वर्ष होते हैं और द्वापर के 4320000×2=8640000वर्ष

और त्रेता के 4320000 x3=12960000 वर्ष

अब अगर त्रेता के मध्य में भी राम हुये थे तो इसका आधा

यानि 6480000 वर्ष +8640000 +कलि के कृष्ण की मृत्युके समय कलि शुरू माना गया है तो भी लगभग 5500 वर्ष मानते हैं ।

तो राम कुल आज से लगभग 15125500 वर्ष पूर्व हुये थे यानि डेढ़ करोड़ वर्ष से भी ज्यादा पहले ये राम और वानर सेना थी।

तो भाई मनुष्य जाति का विकास हुआ 1 लाख वर्ष पूर्व और उन्हें उस समय लिखना पढ़ना नहीं आता था और मनुष्य ने खेती आदि पशुपालन सीखा लगभग 10 हज़ार साल पहले।

तो नल-नील जो काल्पनिक बन्दर हैं इन्होंने कौन सी लिपि और कौन सी भाषा में राम लिखा था क्योंकि बुद्ध के काल तक भी वेद आदि सभी शास्त्र चार्वाक आदि भी अपने शिष्यों को गुरु शिष्य परम्परा से श्रुति मिति यानि बोलकर और रटकर ही सीखते सिखाते थे। उस समय कोई लिपि का विकास नहीं हुआ था एवं यह जो आज की वर्णमाला के ———-

अं

अः

क, ख ,ग ,घ ,ड़

च ,छ ,ज,झ,ञ

ट ,ठ ,ड ,ढ़, ण

त ,थ, द ,ध ,न

प,फ,ब, भ,म

य, र ,ल,व ,स,श,ष, क्ष ,ह

आदि लिखने का तरीका है ये तो मात्र 500 से 800 वर्ष पुराना ही है इससे पहले ये अक्षर अलग प्रकार से लिखे जाते थे और भाषा भी बहुत बदल गयी तब से लेकर आज तक और नित्य प्रति दिन बदल रही है ।

तो इतने साल पहले तो डायनासौर थे डेढ़ करोड़ साल पहले कोई स्तनधारी जीव भी नहीं था विकसित रूप में जो भी स्तनधारी जीव थे धरती पर वे बिलों में रहते थे, तब एक बहुत बड़े उल्का पिण्ड के पृथ्वी से टकराने पर प्रलय हुई जिससे सारे बड़े जीव जो पृथ्वी पर थे जल में थे वे डायनासोर की प्रजातियां नष्ट हो गयी और बाद में धीरे-धीरे विकास के फलस्वरूप बचे हुए नन्हे स्तनधारी वर्ग के जीवों को फलने-फूलने का मौक़ा मिला, तो इसी कारण किसी पाखण्ड शास्त्र में डायनासोर का नाम नहीं और बातें गप्पे भर दिये पण्डा ने क्योंकि वे हीन बुध्दि प्राणी सोचते रहे कि दुनिया में कोई बात खोज नहीं सकेगा, बस वे जो भी बकवास करंगे उसे लोकोक्ति के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी लोग मानते रहेंगे और आज राम का नाम लेकर नित नया अंधविश्वास फैलाते हैं सबसे बड़ी बात जो लोग बेचारे साइंस और जीव विज्ञान की खोजों को यथारूप नहीं जानते वे माने तो माने यहां तो लुळ पढ़े लिखे भी ऐसी बकवास को धारण करते और प्रचारित करते दीख पड़ते हैं ।

क्या प्राणियों के अंदर आत्मा का अस्तित्व होता है

जरूर पढ़ें

*तथागत बुद्ध से ज्ञान पाने या ज्ञान का मुकाबला करने की नियत से बहुत से ब्राह्मण विद्वान आते रहते थे| ऐसे ही एक ब्राह्मण/पंडित का तथागत बुद्ध से निम्न वार्तालाप “धम्म” के परिचय के लिए पढ़ना बहुत उपयोगी होगा।*

एक बार तथागत से एक ब्राह्मण ने पूछा

ब्राह्मण:– “आप सब लोगो को ये बताते है कि आत्मा नहीं, स्वर्ग नहीं, पुनर्जन्म नहीं। क्या यह सत्य है?”

तथागत :- – “आपको ये किसने बताया कि मैंने ऐसा कहा?”

ब्राह्मण:-– “नहीं ऐसा किसी ने बताया नहीं।”

तथागत :- — “फिर मैंने ऐसे कहा ये बताने वाले व्यक्ति को आप जानते हो??

ब्राह्मण:- – “नहीं।”

तथागत : — “मुझे ऐसा कहते हुए आपने कभी सुना है?”

ब्राह्मण:- – “नहीं तथागत,

पर लोगो की चर्चा सुनके ऐसा लगा। अगर ऐसा नहीं है तो आप क्या कहते है?”

तथागत :— “मैं कहता हूँ कि मनुष्य को वास्तविक सत्य स्वीकारना चाहिए।”

ब्राह्मण:- – “मैं समझा नहीं तथागत, कृपया सरलता में बताइये।”

तथागत : – — “मनुष्य की पांच बाह्य ज्ञानेंद्रिय है। जिसकी मदद से वह सत्य को समझ सकता है।”

1)आँखे- मनुष्य आँखों से देखता है।

2)कान- मनुष्य कानो से सुनता है।

3)नाक- मनुष्य नाक से श्वास लेता है।

4)जिव्हा- मनुष्य जिव्हा से स्वाद लेता है।

5)त्वचा- मनुष्य त्वचा से स्पर्श महसूस करता है।

इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से दो या तीन ज्ञानेन्द्रियों की मदद से मनुष्य सत्य जान सकता है।

ब्राह्मण:– “कैसे तथागत?”

तथागत :— “आँखों से पानी देख सकते है, पर वह ठण्डा है या गर्म है, ये जानने के लिए त्वचा की मदद लेनी पड़ती है, वह मीठा है या नमकीन ये जानने के लिए जिव्हा की मदद लेनी पड़ती है।

ब्राह्मण:– “फिर भगवान है या नहीं इस सत्य को कैसे जानेंगे तथागत?”

तथागत : — “आप वायु को देख सकते है?”

ब्राह्मण:- – “नहीं तथागत।”

तथागत : – “इसका मतलब वायु नहीं है ऐसा होता है क्या?”

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत :– “वायु दिखती नहीं फिर भी हम उसका अस्तित्व नकार नहीं सकते, क्योंकि हम वायु को ही साँस के द्वारा अंदर लेते है और बाहर निकालते है। जब वायु का झोंका आता है तब पेड़-पत्ते हिलते है, ये हम देखते है और महसूस करते है। अब आप बताओ भगवान हमें पांच ज्ञानेन्द्रियों से महसूस होता है?

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत:– “आपके माता पिता ने देखा है, या ऐसा उन्होंने आपको बताया है?”

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत :– “फिर परिवार के किसी पुर्वज ने देखा है, ऐसा आपने सुना है?”

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत :– “मैं यही कहता हूँ कि जिसे आज तक किसी ने देखा नहीं, जिसे हमारी ज्ञानेन्द्रियों से जान नहीं सकते, वह सत्य नहीं है इसलिए उसके बारे में सोचना व्यर्थ है।”

ब्राह्मण:– “वह ठीक है तथागत, पर हम जिन्दा है, इसका मतलब हमारे अंदर आत्मा है, ये आप मानते है या नहीं?”

तथागत :– “मुझे बताइये, मनुष्य मरता है, मतलब तब क्या होता है?”

ब्राह्मण:– “आत्मा शरीर के बाहर निकल जाती है, तब मनुष्य मर जाता है।”

तथागत :- – “मतलब आत्मा नहीं मरती है?”

ब्राह्मण:- – “नहीं तथागत, आत्मा अमर है।”

तथागत :– “आप कहते है कि आत्मा कभी मरती नहीं, आत्मा अमर है, तो ये बताइये आत्मा शरीर छोड़ती है या शरीर आत्मा को??”

ब्राह्मण:– “आत्मा शरीर को छोड़ती है तथागत।”

तथागत :– “आत्मा शरीर क्यों छोड़ती है?”

ब्राह्मण:– “जीवन ख़त्म होने के बाद छोड़ती है।”

तथागत :- – “अगर ऐसा है तो मनुष्य कभी मरना नहीं चाहिए। दुर्घटना, बीमारी, घाव लगने के बाद भी बिना उपचार के जीना चाहिए। बिना आत्मा की मर्ज़ी के मनुष्य नहीं मर सकता।”

ब्राह्मण:– “आप सही कह रहे है तथागत। पर मनुष्य में प्राण है, उसे आप क्या कहेंगे?”

तथागत : – “आप दीपक जलाते है?”

ब्राह्मण:- – “हाँ तथागत।”

तथागत :– “दीपक याने एक छोटा दिया, उसमे तेल, तेल में बाती और उसे जलाने के लिए अग्नि चाहिए, बराबर?”

ब्राह्मण:– “हाँ तथागत।”

तथागत :- – “फिर मुझे बताइये बाती कब बुझती है?”

ब्राह्मण:- – “तेल ख़त्म होने के बाद दीपक बुझ़ता है तथागत।”

तथागत :– “और?”

ब्राह्मण:– “तेल है पर बाती ख़त्म हो जाती है तब दीपक बुझता है तथागत।”

तथागत : – “इसके साथ तेज वायु के प्रवाह से, बाती पर पानी डालने से, या दिया टूट जाने पर भी दीपक बुझ सकता है।अब मनुष्य शरीर भी एक दीपक समझ लेते है, और प्राण मतलब अग्नि यानि ऊर्जा। सजीवों की देह अनंत उर्जा के तत्वों से बना है।

इसमें से एक भी पदार्थ अलग कर देंगे ऊर्जा और ताप का निर्माण होना रुक जायेगा,मनुष्य निष्क्रिय हो जायेगा। इसे ही मनुष्य की *मृत्यु* कहा जाता है।इसलिये आत्मा भी भगवान की तरह *अस्तित्वहीन* है। यह सब चर्चा व्यर्थ है। इससे ‘धम्म’ का समय व्यर्थ हो जाता है।”

ब्राह्मण:– “जी तथागत, फिर ‘धम्म’ क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?”

तथागत :- – “धम्म’ का मतलब अँधेरे से प्रकाश की और ले जाने वाला *मार्ग* है।

“धम्म’ का उद्देश्य मनुष्य के जन्म के बाद मृत्यु तक कैसे जीवन जीना है इसका मार्गदर्शन करना है।

जीवन के सूत्रों को समझना और उनके उपयोग से जीवन से दुःख दूर करने का मार्ग है “धम्म”!

प्रकृति के नियमों की समझ और उसके हिसाब से जीवन के दुखों का समाधान का मार्ग है ”धम्म”, प्रकृति की पूजा “धम्म” नहीं है।

“धम्म” जिज्ञासाओं को काल्पनिक धार्मिक कहानियों द्वारा मारना नहीं, धम्म जानने का, खोजने का नाम है। यह विज्ञान है|

धम्म का आधार अनुभव है आस्था या अंधभक्ति नहीं, धम्म जानने के बाद मानने में है, आस्था में नहीं|

धम्म मानव को मानव और जीवों का सहारा बनाने में है, धम्म अपना सहारा खुद बनने में है, न ही किसी देवकृपा के इंतज़ार में बैठे रहने में है|

दुःख दो प्रकार के होते हैं एक प्राकृतिक दूसरा मानव निर्मित,प्राकृतिक दुःख का इलाज तो आपके तथाकथित ईश्वर के पास भी नहीं वो भी रोकने में असमर्थ है तो फिर ईश्वर भक्ति क्यों?

धम्म मानव निर्मित दुखों का समाधान है। क्योंकि हमारे जीवन में प्राकृतिक दुःख एक तालाब के सामान हैं पर मानव निर्मित दुःख समुन्द्र के समान है| मतलब दुखों का सबसे बड़ा हिस्सा मानव निर्मित है, जैसे सामाजिक असमता, गुलामी, रोग, मैत्री का अभाव आदि!

“धम्म” समता, स्वतंत्रता, करुणा, न्याय और मैत्री का भाव जगाता है !

धम्म का प्रथम सूत्र है:- हर चीज़ से बड़ा है न्याय, तथाकथित ईश्वर से भी बड़ा, न्याय व्यस्था ही धम्म है| क्या गुलामी और शोषण के बदले आप ईश्वर लेना चाहोगे?

*जन्म से मृत्यु के बीच सभी जीवों का जीवन सुखमय बनाना ही धम्म का अंतिम लक्ष्य है|*

*ब्राह्मण*:- मैं धन्य हुआ आपने मेरी आँखे खोल दीं, आपसे बात करके मेरा धार्मिक ज्ञान का, श्रेष्ठता का अहंकार जाने कहाँ गायब हो गया, बड़ा मुक्त और हल्का महसूस कर रहा हूँ, अपना पराया का भ्रम दूर हुआ, सब अपने से लगने लगे| आपसे ज्ञान पाकर मेरा जीवन धन्य हुआ तथागत !

ग्राम सभा भरखनी के प्रधान पति महेश शर्मा

ग्राम सभा भरखनी के मजरा खदिया नगला मे स्कूल की पड़ी हुई जमीन पर प्रधान पति महेश शर्मा ने अवैध तरीके से कब्जा करवा दिया है ।

पड़ी हुई जमीनमें एक हैंडपंम्प लगा हुआ है

उसे जमीन के ऊपर मिट्टी डलवा करके उस हैंडपंप को अंदर ही बंद करवा दिया जिसकी प्रमाण स्वरूप फोटो आप लोग देख रहे हैं ।

इस हैंड पाइप के माध्यम से पूरे मोहल्ले में लोग अपने अपने पशुओं को पानी पिलाते थे नहलाते थे ।

और स्वयं उसका उपयोग करते थे ।

ऐसा होने पर अब पूरे मोहल्ले के लोगों को बहुत बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है ।

होलिका दहन की सत्य कथा,, होलिका दहन की सच्चाई

होलिका दहन की सत्य कथा

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लगभग ईसा से 3100 साल पहले इडिया में यूरेशिया की एक खूंखार जाति जिसको आर्य कहा जाता था का आगमन हुआ था। यूरेशिया, यूरोप और एशिया के बीच की जगह का नाम है और आज भी यह स्थान काला सागर के पास मौजूद है। इस बात के आज बहुत से प्रमाण भी मौजूद है। ज्यादा जानकारी के लिए आप लोग हमारा लिखा लेख “DNA REPORT 2001” पढ़ सकते है। यह आर्य लोग इडिया में क्यों आये यह बात आज तक रहस्य ही है।

बहुत से इतिहासकारों ने इस विषय पर बहुत सी बाते और कहानियाँ लिखी है लेकिन किसी भी कहानी का कोई वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है। भीम संघ की टीम ने अपने शोधों में पाया है कि आर्य लोग अपनी खुशी से या इंडिया को लूटने के लिए में नहीं आये थे। असल में आर्य एक बहुत ही खूंखार जाति थी। जिसके कारण यूरेशिया के लोगों का जीवन खतरे में आ गया था और हर तरफ अराजकता का माहौल बन गया था। आर्य लोग यूरेशिया के लोगों को हर समय लूटते और मारते रहते थे। जिस से तंग आ कर वहाँ के राजा ने सारे आर्यों को इक्कठा करके एक बड़ी सी नाव में बिठा कर मरने के लिए समुद्र में छोड़ दिया था। यह लोग अपने साथ अपनी औरतों और बच्चों को नहीं लाये थे। औरतों और बच्चों का ना लाना भी आर्यों के देश निकले से सम्बन्ध में एक पुख्ता प्रमाण है। पुराने समय में जब पुरुष को देश निकला दिया जाता था तो बच्चों और औरतों को उसके साथ नहीं भेजा जाता था। यह बाते हिंदू धर्म ग्रंथों और यूरेशिया के लोगों में प्रचलित कहानियों के आधार पर भी सही है। आर्य लोग यूरेशिया के रहने वाले है इस बात के बहुत से प्रमाण है जैसे आर्य लोगों की भाषा का रूस की भाषा से मिलना, ज्योतिष शास्त्र, वास्तु, तंत्र शास्त्र, और मन्त्र शास्त्र जो की वास्तव में मेसोपोटामिया सभ्यता की देन है और DNA पर किये गए शोध आदि। यह सभी वैज्ञानिक प्रमाण है ना की कोई काल्पनिक प्रमाण है। इंडिया के लोगों के DNA पर कुल दो शोध हुए है। जिस में से एक शोध माइकल बामशाद ने लिखा था जिसको सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने भी मान्यता दी थी, जबकि दूसरा शोध राजीव दीक्षित नाम के एक ब्राह्मण ने स्वयं किया था। दोनों शोधों में पाया गया था कि ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रिय यूरेशिया मूल के लोग है। अगर धर्म शास्त्रों को आधार मान लिया जाये तो इस से यह बात भी साफ़ हो जाती है कि यह आर्य लोग समुद्र में भटकते हुए दक्षिण इंडिया के समुद्र तट पर पहुंचे थे। ऋग्वेद, भागवत पुराण, दुर्गा सप्तसती के अनुशार पानी से सृष्टि की उत्पति के सिद्धांत से भी इस बात का पता चल जाता है कि मूलनिवासी आर्य लोग इंडिया में समुद्र के रास्ते आये थे। अर्थात आर्यों को पानी के बीच में धरती दिखाई दी थी या मिली थी। इसीलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में कहा जाता है कि धरती की उत्पति पानी से हुई है।

उस समय इंडिया के मूलनिवासी बहुत ही भोले भाले और सभ्य होते थे। इंडिया में सिंधु घाटी की सभ्यता स्थापित थी। जो उस समय संसार की सबसे उन्नत सभ्यताओं में से एक थी। इंडिया के मूलनिवासी देखने में सांवले और ऊँची कद काठी के और मजबूत शारीर के होते थे। इसके विपरीत आर्य लोग यूरेशिया से आये थे जो एक ठंडा देश है। और वहाँ के लोगों को कम मात्र में सूर्य की रोशनी मिलने से वहाँ के लोग साफ़ रंग के होते थे। यह बात वैज्ञानिक भी प्रमाणित कर चुके है कि ठन्डे प्रदेश के लोगों की चमड़ी का रंग साफ़ होता है। इसी चमड़ी के रंग का फायदा उठा कर आर्यों ने खुद को देव घोषित किया। समय के साथ आर्यों ने देश में अपनी सता स्थापित करने के लिए प्रयास शुरू किये। आर्य लोगों ने इंडिया की सभ्यता को नष्ट करना शुरू करके अपनी सभ्यता स्थापित करने के लिए हर तरह से पूरी कोशिश की। आर्य लोग छल, कपट, प्रपंच और धोखा देने में प्रवीण थे। जिसके कारण बहुत से मूलनिवासी उनकी बातों में फंस जाते। आर्यों ने इंडिया की नारी को अपना सबसे पहला निशाना बनाया, आर्य लोग आधी रात को हमला करते थे और धन धान्य के साथ साथ मूलनिवासी लोगों की बहु बेटियों को भी अपने साथ ले जाते थे। बाद में ब्राह्मणों ने बहुत सी प्रथाओं को लागू करवाया। समय के अनुसार प्रथाएं परम्पराओं में परिवर्तित हुई और आज भी इंडिया की नारी उन्ही प्रथाओं के कारण शोषण का शिकार हो रही है।

इंडिया के मूलनिवासी राजा आर्यों के यज्ञ, बलि और तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों के खिलाफ थे। क्योकि इन अनुष्ठानों से पशु धन, अनाज और दूसरे प्रकार के धन की हानि होती थी। जबकि धार्मिक अनुष्ठानों की आड़ में आर्य लोग अयाशी करते थे। ऋग्वेद को पढ़ने पर पता चलता है कि आर्य लोग धर्म के नाम पर कितने निकृष्ट कार्य करते थे। अनुष्ठानों में सोमरस नामक शराब का पान किया जाता था, गाये, बैल, अश्व, बकरी, भेड़ आदि जानवरों को मार कर उनका मांस खाया जाता था। पुत्रेष्टि यज्ञ, अश्वमेघ यज्ञ, राजसु यज्ञ के नाम पर सरेआम खुल्म खुला सम्भोग किया जाता था या करवाया जाता था। इन प्रथाओं, जो आज परम्परायें बन गई है के बारे ज्यादा जानकारी चाहिए तो आप लोग ऋग्वेद का दशवा मंडल, अथर्ववेद, सामवेद, देवी भागवत पुराण, वराह पुराण, आदि धर्म ग्रन्थ पढ़ सकते है।

एक समय आर्यों ने इंडिया केएक शक्तिशाली राजा हिरण्यकश्यप के राज्य पर हमला किया और वहाँ अपना राज्य और अपनी सभ्यता को स्थापित करने की कोशिश की तो राजा हिरण्यकश्यप ने भी आर्यों की अमानवीय संस्कृति का विरोध किया। राजा हिरण्यकश्यप जो की एक नागवंशी राजा था ने नागवंश के धर्म के मुताबिक़ आर्यों को अधर्मी और कुकर्मी करार दिया तथा आर्यों के धर्म को मानने से इंकार कर दिया। आर्यों ने हर संभव प्रयत्न करके देखा लेकिन उनको सफलता नहीं मिल पाई। यहाँ तक आर्यों के राजाओं ब्रह्मा और विष्णु सहित उनके सेनापति इन्द्र को कई बार राजा हिरण्यकश्यप ने बहुत बुरी तरह हराया। राजा हिरण्यकश्यप इतना पराक्रमी था कि उन्होंने इन्द्र की तथाकथित देवताओं की राजधानी अमरावती को भी अपने कब्जे में कर लिया। जब आर्यों का राजा हिरण्यकश्यप पर कोई बस नहीं चला तो अंत में आर्यों ने एक षड्यंत्रकारी योजना के तहत विष्णु ने राजा हिरण्यकश्यप को मौत के घाट उतार दिया। लेकिन आर्यों को हिरण्यकश्यप की मृत्यु का कोई फायदा नहीं हुआ क्योकि हिरण्यकश्यप की प्रजा ने आर्यों के शासन मानने से इंकार कर दिया और हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष को राजा स्वीकार कर लिया। आर्यों का षड़यंत्र असफल हो गया था। राजा हिरण्याक्ष भी बहुत शक्तिशाली योद्धा था जिसका सामना युद्ध भूमि में कोई भी आर्य नहीं कर पाया। राजा हिरण्याक्ष के डर से आर्य भाग खड़े हुए। यहाँ तक देवताओं की तथाकथित राजधानी अमरावती को हिरण्याक्ष ने पूरी तरह बर्बाद कर दिया। हिरण्याक्ष के पराक्रम से डरे हुए आर्यों ने एक बार फिर राजा हिरण्याक्ष को मारने के लिए एक षड्यंत्र रचा। षड्यंत्र को अंजाम देने के लिए हिरण्याक्ष की पत्नी रानी कियादु को मोहरा बनाया गया। विष्णु नाम के आर्य ने रानी कियादु को पहले अपने प्रेम जाल में फंसाया और उसके बाद रानी कियादु को अपने बच्चे की माँ बनने पर विवश किया। विष्णु कई बार हिरण्याक्ष की अनुपस्थिति में रानी के पास भेष बदल बदल कर आता रहता था।

हिरण्याक्ष राज्य के कार्यों में व्यस्त रहता था, जिसके चलते विष्णु और कियादु के प्रेम के बारे राजा हिरण्याक्ष को पता नहीं चला। समय के साथ रानी कियादु ने एक बच्चे को जन्म दिया और बच्चे का नाम प्रहलाद रखा गया। राजा हिरण्याक्ष राज्य के कार्यों में व्यस्त रहते थे इस का पूरा फायदा विष्णु ने उठाया और बचपन से ही प्रहलाद को आर्य संस्कृति की शिक्षा देनी शुरू कर दी। जिसके कारण प्रहलाद ने नागवंशी धर्म को ठुकरा कर आर्यों के धर्म को मानना शुरू कर दिया। समय के साथ हिरण्याक्ष को पता चला कि उसका खुद का बेटा नागवंशी धर्म को नहीं मानता तो रजा को बहुत दुःख हुआ। राजा हिरण्याक्ष ने प्रहलाद को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन प्रहलाद तो पूरी तरह विष्णु के षड्यंत्र का शिकार हो गया था और उसने अपने पिता के खिलाफ आवाज उठा दी। इसके चलते दोनों पिता और पुत्र के बीच अक्सर झगड़े होते रहते थे।

उसके बाद आर्यों ने प्रहलाद को राजा बनाने के षड्यंत्र रचा कि हिरण्याक्ष को मार कर प्रहलाद को अल्पायु में राजा बना दिया जाये। इस से पूरा फायदा आर्यों को मिलाने वाला था। रानी कियादु पहले ही विष्णु के प्रेम जाल में फंसी हुई थी और प्रहलाद अल्पायु था। इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से विष्णु का ही राजा होना तय था। आर्यों के इस षड्यंत्र की खबर किसी तरह हिरण्याक्ष की बहन होलिका को लग गई। होलिका भी एक साहसी और पराक्रमी महिला थी। स्थिति को समझ कर होलिका ने प्रहलाद को अपने साथ कही दूर ले जाने की योजना बनाई। एक दिन रात को होलिका प्रहलाद को लेकर राजमहल से निकल गई, लेकिन आर्यों को इस बात की खबर लग गई। आर्यों ने होलिका को अकेले घेर कर पकड़ लिया और राजमहल के पास ही उसके मुंह पर रंग लगा कर जिन्दा आग के हवाले कर दिया। होलिका मर गई और प्रहलाद फिर से आर्यों को हासिल हो गया। इस घटना को आर्यों ने दैवीय धटना करार दिया कि कभी आग में ना जलने वाली होलिका आग में जल गई और प्रहलाद बच गया। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था आर्यों ने प्रहलाद को हासिल करने के लिए होलिका को जलाया था। हिरण्याक्ष को आमने सामने की लड़ाई में हराने का सहस किसी भी आर्य में नहीं था। तो हिरण्याक्ष को छल से मारने का षड्यंत्र रचा गया। एक दिन विष्णु ने सिंह का मुखोटा लगा कर धोखे से हिरण्याक्ष को दरवाजे के पीछे से पेट पर तलवार से आघात करके मौत के घाट उतार दिया। ताकि राजा को किसने मारा इस बात का पता न चल सके। इस प्रकार धोखे से आर्यों ने मूलनिवासी राजा हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष के राज्य को जीता और प्रहलाद को राजा बना कर उनके राज्य पर अपना अधिपत्य स्थापित किया।

हम होली अपने महान राजा हिरण्यकश्यप और वीर होलिका के बलिदान को याद रखने हेतु शोक दिवस के रूप मे मनाते थे और जिस तरह मृत व्यक्ति की चिता की हम आज भी परिक्रमा करते है और उस पर गुलाल डालते है ठीक वही काम हम होली मे होलिका की प्रतीकात्मक चिता जलाकर और उस पर गुलाल डालकर अपने पूर्वजो को श्रद्धांजलि देते आ रहे थे ताकि हमे याद रहे की हमारी प्राचीन सभ्यता और मूलनिवासी धर्म की रक्षा करते हुए हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणो की आहुति दी थी। लेकिन इन विदेशी आर्यों अर्थात ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रियों ने हमारे इस ऐतिहासिक तथ्य को नष्ट करने के लिए उसको तोड़ मरोड़ दियाऔर उसमे “विष्णु” और उसका बहरूपिये पात्र “नृसिंह अवतार” की कहानी घुसेड़ दी। जिसकी वजह से आज हम अपने ही पूर्वजो को बुरा मानते आ रहे है, और इन लुटेरे आर्यों को भगवान मानते आ रहे है।

ये विदेशी आर्य असल मे अपने आपको “सुर” कहते थे क्योकि यह लोग सोम रस नाम की शराब का पान करते थे। और हमारे भारत के लोग और हमारे पूर्वज राजा शराब नहीं पिटे थे इसलिए आर्य लोग मूलनिवासियों और राजाओं को असुर कहते थे। और इन लुटेरों/डकैतो की टोली के मुख्य सरदारो को इन्होने भगवान कह दिया और अलग अलग टोलियो/सेनाओ के मुखिया/सेनापतियों को इन्होने भगवान का अवतार दिखा दिया अपने इन काल्पनिक वेद-पुराणों मे। और इस तरह ये विदेशी आर्य हमारे भारत के अलग-अलग इलाको मे अपने लुटेरों की टोली भेजते रहे और हमारे पूर्वज राजाओ को मारकर उनका राजपाट हथियाते रहे। और उसी क्रम मे इन्होने हमारे अलग-अलग क्षेत्र के राजाओ को असुर घोषित कर दिया और वहाँ जीतने वाले सेनापति को विभिन्न अवतार बता दिया। और आज इससे ज्यादा दुख की बात क्या होगी की पूरा देश यानि की हम लोग इनके काल्पनिक वेद-पुराणों मे निहित नकली भगवानों याने हमारे पूर्वजो के हत्यारो को पूज रहे है और अपने ही पूर्वजो को हम राक्षस और दैत्य मानकर उनका अपमान कर रहे है।

याद रहे की वेदो और पुराणों मे लिखा है की सारे भगवान “लाखो” साल पुराने है और भगवान अश्व अर्थात घोड़े की सवारी किया करते थे और विष्णु का वाहन “गरुड़” पक्षी है लेकिन “घोड़ा(हॉर्स)” और गरुड़ पक्षी भारत मे नहीं पाये जाते थे , ये विदेशी आर्य उन्हे कुछ “सैकड़ों” साल पहले अपने साथ लेकर आए थे, जिससे ये साबित होता है की ये विष्णु और उसके सारे अवतार काल्पनिक है और इन्होने अपनी बनाई हुई सेना के राजाओ और सेनापतियों को ही भगवान और उनका अवतार घोषित किया है।

अब समय आ गया है की हम अपने देश का असली इतिहास पहचाने और अपने पूर्वज राजा जो की असुर या दैत्य ना होकर वीर और पराक्रमी महान पुरुष हुआ करते थे उनका सम्मान करना सीखे और जिन्हे हम भगवान मानते है दरअसल वो हमारे गुनहगार है और हमारे पूर्वजो के हत्यारे है जिनकी पूजा और प्रतिष्ठा का हमे बहिष्कार करना है।

जैसे की दक्षिण भारत मे हमारे एक महान पूर्वज राजा “महिषासुर” थे जिन्हे इन भगवान की नकली कहानियों मे असुर बताया गया है, जबकि वो एक बहुत विकसित राज्य के राजा थे , उसका सबूत उनके नाम पर कर्नाटक मे मौजूद प्रसिद्ध शहर (महिससुर) “मैसूर” है , जहां उनकी प्रतिमा भी मौजूद है।

और प्राचीन केरल राज्य के हमारे महान राजा “बलि” जिनसे उनका राजपाट छल से आर्यों के एक राजा (विष्णु का “बामन” अवतार) ने हड़प लिया था, उनके नाम पर आज भी समुद्र मे मौजूद द्वीप (एक देश) बलि (बालि, जावा, सुमात्रा) नाम से है।

अपना दीपक स्वयं बनो

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नमो बुद्धाय भगवान बुद्ध की जातक कथाएं

🌻धम्म प्रभात 🌻

सुखकर क्या हैं ?

एक समय तथागत गौतमबुद्ध हिमालय की ओर अरण्य कुटी में विहार करते थे ।

उस समय राजा विभिन्न प्रकार से प्रजा को पीडित करते थे।

तब भगवान ने मन में चिंतन-मनन किया —

क्या बिना किसी को पीड़ा दिये राज्य कर सकते हैं या नहीं ?

क्या यह संभव हैं कि जिन्हें पीडि़त नहीं किया जाना चाहिए, उन्हें पीडा से बचाया जा सकते हैं ?

क्या राजा ऐसे न्याय संगत और औचित्यपूर्ण नियम बना सकता हैं ?

वर्तमान राजकीय परिस्थिति में भी यही सवाल हमारे मन में उठते हैं कि सुखकर क्या हैं ? क्योंकि प्रजातंत्र होने पर भी भारत के लोग राज्यकर्ताओं से पीड़ित हैं, राज्यकर्ता भ्रष्ट है, मक्कार है, सत्ता की लालच में देश को बर्बाद करते हैं, देते है- देशभक्ति की दुहाई लेकिन काम देश द्रोह का करते है। समाज में असमानता और अन्याय का तांडव है। धर्म में अधर्म का दुष्प्रभाव है । इन सब दु:खकारक परिस्थितियों में सुखकर क्या है ? – यही सवाल हमारे मनोद्वार पर टकराते हैं।

इन्हीं सवालों के बारे में २५०० पूर्व भगवान ने चिंतन-मनन के समय गाथा में कहा —

“अत्थम्हि जातम्हि सुखा सहाया”-

काम पडने पर मित्रों का होना सुखकर हैं ।

“तुट्ठी सुखा या इतरीतरेन “-

जो मिले उससे सन्तुष्ट रहना सुख हैं ।

“पुञ्ञं सुखं जीवितसंखयम्हि” —

मृत्यु के उपरान्त पुण्य सुख हैं ।

“सब्बस्स दुक्खस्स सुखं पहाणं” —

सभी दु:खों का प्रहाण सुख हैं ।

“सुखा मत्तेय्यता लोके,अथो पेत्तेय्यता सुखा” –

संसार में माता-पिता की सेवा सुखकर हैं ।

“सुखं याव जरा सीलं”-

वृद्धावस्था तक शील का पालन सुखकर हैं ।

“सुखो पञ्ञाय पटिलाभो”-

ज्ञान का लाभ करना सुखकर हैं ।

“पापानं अकरणं सुखं”–

पापों का न करना सुखकर हैं ।

चलो बुद्ध की ओर

बुद्धम् शरणम् गच्छामी।

धंम्मम् शरणम् गच्छामी।

संघम् शरणम् गच्छामी।

मौर्य कोई जाति नही एक संस्कृति है

🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🙏

मित्रों

मौर्य कोई जाति नहीं बल्कि संस्कृति है

जैसे ब्राह्मण संस्कृति है, ठीक वैसे ही

मौर्य राजवंश की अपनी भारतीय मूल संस्कृति बुद्धत्व पर आधारित है

इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि देश में हजारों बर्षों से ब्रहमण संस्कृति और मौर्य संस्कृति में 36का आंकड़ा रहा है

मौर्य संस्कृति सदैव समाज को ऊपर ले जाने वाली संस्कृति है.

मौर्य शब्द मुकुट ( मौर)को धारित किये है.जो मानवता के शिखर पर पहुंच गई संस्कृति है

मूल मंत्र *जियो और जीने दो* पर ही आधारित है

अशोक स्तंभ का निर्माण मौर्य संस्कृति को समर्पित है.जिसमें श्रमण संस्कृति ही मौर्य संस्कृति ध्वज वाहक है

हर नागरिक ज्ञान ध्यान श्रम से समाज निर्माण देश निर्माण में अपनी भागीदारी हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है

झूठ पाखंड जुमला बाजी से कोसों दूर श्रम की महत्ता सर्बोच्चता के बल पर उत्पादन आत्मनिर्भरता सम्पन्नता उत्कृष्टता ही लक्ष्य है

आओ संकल्प लें कि हम आप सब मौर्य संस्कृति का गहरा अध्ययन करें और जन जन तक मानवतावादी संस्कृति से परिचय करायें

ताकि समाज देश सही दिशा में आगे बढ़े और जनकल्याण हो..

जय मौर्य राजवंश

जय मौर्य संस्कृति

🌳जय 🙏सम्राट 🌳

विश्व बौद्ध “धम्म ध्वज” दिवस पंचशील झंडे का संपूर्ण इतिहास विवरण

🌹 विश्व बौद्ध “धम्म ध्वज” दिवस 🌹

8 जनवरी,1880 बौद्ध जगत में विशेष महत्व का दिन है क्योंकि इसी दिन “#धम्म_ध्वज” की स्थापना हुई थी | यह धम्म ध्वज सम्पूर्ण विश्व को शांति, प्रगति मानवतावाद और समाज कल्याण की सदैव प्रेरणा देता है | इस धम्म ध्वज में पांच रंग होते है जिनका अपना अर्थ और भाव है | चूँकि इस #धम्म_ध्वज_में_पांच_रंग_हैं_इसलिए_इसको_पंचशील_का_झंडा_भी_कहा_जाता_है | धम्म ध्वज हमारी आन, बान और शान है |

आओ धम्म ध्वज के पांच रंगों के भावार्थ को हम समझें..

(1) #नीला :- बौद्ध धम्म मे प्रेम और दया इस प्यारी संकल्पना को दर्शाता है |समानता और व्यापकता- अर्थात इस नीले आसमान के नीचे सभी व्यक्ति सामान है | सार्वभौमिक करुणा | सभी प्राणी मात्र के प्रति कल्याण करने की भावना रखना |

‘#सब्बे सत्ता सुखी होन्तु’/ #भवतु सब्ब मंगलं

(2) #पीला :- #मध्यममार्ग का प्रतिक| जैसा कि विदित है कि बुद्ध ने मध्यम मार्ग हेतु अष्टांगिक मार्ग पर चलने का रास्ता बताया है जो ‘निर्वाण’ प्राप्ति यानि चरित्र सम्पन्न, उत्कृष्ट जीवन जीने का, प्रगति का सरल और सुस्पष्ट मार्ग है |

(3) #लाल :- बुद्ध का उपदेश दर्शाने वाला … विद्वत्ता, सद्गुण और सम्मान का प्रतिक | गतिशीलता और दृढ़ निश्चय | उर्जावान और परिश्रमी बनना | प्रत्येक व्यक्ति को धर्मानुसार आचरण करना चाहिए | अपने वांक्षित उद्देश्य की पूर्ति तथा जनकल्याण के लिए कठिन परिश्रम करना चाहिए | धम्म की रक्षा हेतु बलिदान तक करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए |

(4) #सफेद :- बुद्ध उपदेश की #पवित्रता दर्शाने वाला, स्वतंत्रता शांति और शुद्धता | मन , वचन और कर्म से व्यक्ति शुद्ध और पवित्र होना चाहिए | शीलवान और चरित्र संपन्न व्यक्ति बनने का हर संभव प्रयास करना चाहिए | सफ़ेद रंग भगवान बुद्ध के विचारों की पवित्रता और शुद्धता का घोतक है |

(5) #नारंगी/#केसरिया:- बौद्ध धम्म का सार, बुद्ध के पाठ की विद्वत्ता, सामर्थ्य और प्रतिष्ठा पूर्ण है|त्याग और सेवा – प्रज्ञा , बुद्धिवाद, उच्चतम शिक्षा की प्राप्ति। प्रत्येक व्यक्ति को सुशिक्षित होने के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा लेनी चाहिए।शिक्षा प्राप्त करना, ज्ञान प्राप्त करना बुद्ध धम्म का प्रथम सन्देश है | मन को सुसंस्कृत और नियंत्रित करने के लिए शिक्षा नितांत आवश्यक है | अतः प्रत्येक व्यक्त्ति को अच्छी से अच्छी शिक्षा मिलनी ही चाहिए | उचित शिक्षा के द्वारा ही व्यक्त्ति प्रज्ञावान बनता है और सेवा और त्याग के लिए तत्पर रहता है | केसरिया भगवान बुद्ध के चीवर का रंग है जो शक्त्ति और साहस को दर्शाता है |

इन अखंड पाच रंगो का संयोजन इसकी सत्यता का प्रमाण है |

इस प्रकार “धम्म ध्वज” से संपूर्ण बौद्ध धम्म का भाव और सार प्रकट होता है इसलिए धम्म ध्वज को पूरा आदर और सम्मान देना चाहिए |

#चलो बुद्ध की ओर

#बुद्धम् शरणम् गच्छामी।

#धंम्मम् शरणम् गच्छामी।

#संघम् शरणम् गच्छामी।

बौद्ध चर्या एवं संस्कार विधि ,,सिद्धार्थ एकेडमी रूपापुर हरदोई

शाक्यमुनि तथागत भगवान गौतम बुद्ध के वंशजों को

🌺नमो बुद्धाय🌺

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प्रिय बंधुओं एवं बहनों आज बुद्ध की यह धरती हमें पुकार रही है ।

हम अपने ही पूर्वज भगवान बुद्ध कोबुलाकर कहीं भटक गए हैं ।

कैसी विडंबना है कि उस बुद्ध को उन्हीं के वंशजों ने उन्हीं के देश में भुला दिया है ।

जीने के सिद्धांतों को संसार के अधिकांश देशों ने ग्रहण कर शांति प्राप्त की है।

जिन की शिक्षाओं को ग्रहण कर संपूर्ण विश्व अपना उद्धार कर रहा है । हम उनको भूलकर किस रास्ते पर चल रहे हैं।

आइए बंधुओं समय की पुकार को सुनिए और वापस लौट चलिए अपने घर की ओर धम्म की ओर बुद्ध की ओर क्योंकि सुबह का भूला यदि शाम को लौट आता है तो वह भूला नहीं कहलाता है ।

साथियों
(बोधिचर्या एवं संस्कार विधि) नामक इस पुस्तिका को तैयार करने का उद्देश्य बहुत संस्कारों को जन जन तक पहुंचाने का है।
पिछले कई वर्षों से सैकड़ों लोगों के धम्म दीक्षा लेने के बावजूद संस्कार परिवर्तित नहीं हो पाए जिसके दो कारण हो सकते हैं

पहला ::संस्कार संबंधी उचित साहित्य एवं कुशल प्रतिनिधित्व न होना ।

दूसरा :: भावावेश में बौद्ध धम्म दीक्षालेना और पुराने मत एवं मान्यताओं का मन से न निकल पाना।

इस पुस्तिका के माध्यम से बहुत संस्कारों को थोड़ी सी एवं उचित जानकारी देने का प्रयास किया गया है यदि इस माध्यम से एक व्यक्ति भी वापस लौट आता है तो मैं स्वयं को धन्य मानूंगा और मेरा उद्देश्य सफल होगा

।।।।।।।।।धन्यवाद।।।।।।।।।

पुस्तक प्राप्त करने के लिए कृपया संपर्क करें

☎ 91 98 97 9617

☎ 6392 6676 पर

शाक्य बिजय सिंह कुशवाहा

प्रबंधक ,, सिद्धार्थ अकेडमी

रूपापुर हरदोई

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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

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