गौतमबुद्ध म्यूजिक प्रोडक्शन खदिया नगला भरखनी

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी जिला हरदोई उत्तर प्रदेश गौतमबुद्ध म्यूजिक प्रोडक्शन खदिया नगला भरखनी जिला हरदोई 9198979617

Lal Bihari baudh लाल बिहारी बौद्ध

अत्यंत दुःखद समाचार।
आज बहुजन समाज के महान योद्धा व अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महासभा के अध्यक्ष आदरणीय लाल बिहारी बौद्ध परिनिर्वाण को प्राप्त हो गये हैं ।प्रकृति उनकी चेतना को शांति दें।
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तथागत बुद्ध से प्रार्थना है कि परिनिब्बत आत्मा को शांति प्रदान करे,एवं उनके परिवार पर पड़े इस असीम दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।
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खदिया नगला भरखनी budhpurnima San 2021

🌹 आप सबको नमो. बौद्ध🌹
बुद्ध ने ज्ञान के सार को कुल 55 बिंदुओं में समेट दिया।
चार – आर्य सत्य
पाँच – पंचशील
आठ – अष्टांगिक मार्ग और
अड़तीस – महामंगलसुत

बुद्ध के चार आर्य सत्य

1. दुनियाँ में दु:ख है।
2. दु:ख का कारण है।
3. दु:ख का निवारण है। और
4. दु:ख के निवारण का उपाय है।
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पंचशील

1. झूठ न बोलना
2. अहिंसा
3. चोरी नहीं करना
4. व्यभिचार नहीं करना और
5. नशापान/मद्यपान नहीं करना
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अष्टांगिक मार्ग

1. सम्यक दृष्टि (दृष्टिकोण) /Right view
2. सम्यक संकल्प / Right intention
3. सम्यक वाणी / Right speech
4. सम्यक कर्मांत/ Right action
5. सम्यक आजीविका/ Right livelihood (profession)
6. सम्यक व्यायाम / Right exersie (physical activity)
7. सम्यक स्मृति / Right mindfulness
8. सम्यक समाधि / Right meditation (Vpasana Meditation)

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तथागत बुद्ध ने 38 प्रकार के मंगल कर्म बताये है जो महामंगलसुत के नाम से भी जाना जाता है, निम्न प्रकार है

2. बुद्धिमानों की संगति करना।
3. शीलवानो की संगति करना।
4. अनुकूल स्थानों में निवास करना।
5. कुशल कर्मों का संचय करना।
6. कुशल कर्मों में लग जाना।
7. अधिकतम ज्ञान का संचय करना।
8. तकनीकी विद्या अर्थात शिल्प सीखना।
9. व्यवहार कुशल एवं विनम्र होना।
10. विवेकवान होना।
11. सुंदर वक्ता होना।
12. माता पिता की सेवा करना।
13. पुत्र-पुत्री-स्त्री का पालन पोषण करना।
14. अकुशल कर्मों को ना करना।
15. बिना किसी अपेक्षाके दान देना।
16. धम्म का आचरण करना।
17. सगे सम्बंधियों का आदर सत्कार करना।
18. कल्याणकारी कार्य करना।
19. मन, शरीर तथा वचन से परपीड़क कार्य ना करना।
20. नशीली पदार्थों का सेवन ना करना।
21. धम्म के कार्यों में तत्पर रहना।
22. गौरवशाली व्यक्तित्व बनाए रखना।
23. विनम्रता बनाए रखना।
24. पूर्ण रूप से संतुष्ट होना अर्थात तृप्त होना।
25. कृतज्ञता कायम रखना।
26. समय समय पर धम्म चर्चा करना ।
27. क्षमाशील होना।
28. आज्ञाकारी होना।
29. भिक्षुओ, शीलवान लोगों का दर्शन करना।
30. मन को एकाग्र करना।
31. मन को निर्मल करना।
32. सतत जागरूकता बनाए रखना ।
33. पाँच शीलों का पालन करना।
34. चार आर्य सत्यों का दर्शन करना ।
35. आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलना।
36. निर्वाण का साक्षात्कार करना।
37. लोक धम्म लाभ हानि, यश अपयश, सुख-दुख,जय-पराजय से विचलित ना होना।
38. शोक रहित, निर्मल एवं निर्भय होना।

अगर कोई अपने दैनिक जीवन में इन 38 मंगल कर्मों का पालन करने लग जाये, तो उसके जीवन से सारे दुःख एवं परेशानियां हमेशा के लिए दूर हो जायेंगी।।।

अध्यात्म के क्षेत्र में गहरा उतरने वालों को त्रिपिटक का अध्ययन करना चाहिए

किंतु, गृहस्थ जीवन सफल और सम्मानित तरीके से जीने और निर्वाण प्राप्त करने के लिए यहाँ दी गई 55 बातें हीं काफी (सफिसियेंट) है।

तो आईये। बुद्ध के बताये मार्ग पर चलकर जीवन यापन करें और धार्मिक आडंबरों और पाखंड से दूर रहें।

बुद्धं शरणम गच्छामि!
धम्मं शरणम गच्छामि!
संघम् शरणम गच्छामि!

नमो बुद्धाय….जय सम्राट अशोक

ग्राम भरखनी पंचायत चुनाव सर्वे 2021

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तेरहवाँ शिलालेख पाँच यवन (यूनानी) राजाओं का उल्लेख करता है, जिनके राज्यों में सम्राट अशोक ने धर्मदूत भेजे थे:
1. अंतियोक (सीरिया नरेश)
2. तुरमय (मिस्री नरेश)
3. अंतिकिनी (मेसीडोनिया नरेश)
4. मक (एपीरस नरेश)
5. अलिकसुंदर (सिरीन नरेश)
दूसरा शिलालेख साक्ष्य देता है कि सम्राट अशोक ने यवन साम्राज्य बैक्ट्रिया को भी धर्म-प्रचारक भेजे थे। तत्कालीन गांधार अर्थात् वर्तमान अफगानिस्तान तब यवनों के अधिकार में था। अफगानिस्तान तब बैक्ट्रिया का ही एक भाग था।
सिंहली इतिहास ग्रंथ ‘दीववंश’ तथा ‘महावंश’ उस भिक्षु का नाम तक उल्लेख करते हैं जो धर्म-प्रचार के लिए गांधार गया था। उसका नाम था मञ्झन्तिक।
तिब्बती इतिहासकार तारानाथ उल्लेख करते हैं कि मौर्यवंश, जिसका एक शासक सम्राट अशोक महान भी हुआ है, के एक राजकुमार वीरसेन ने गांधार में अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था। मौर्यवंश का सीधा-सा अर्थ है- बुद्ध श्रद्धालु शासक।
ये सभी संदर्भ साक्ष्य देते हैं कि गांधार से यूनान, मध्य-पूर्व एशिया और खाड़ी देशों, वर्तमान अरब-ईरान-इराक-फारस, तक बुद्ध के दूतों ने पैर फेरा था।
भारत की पश्चिमी सीमा के बाहर बुद्ध की धर्म-पताका ले जाने का प्रथम श्रेय आचार्य मझन्तिक को है। यद्यपि उनके कार्यकलापों का इतिहास में कोई विस्तृत ब्योरा नहीं मिलता है, लेकिन इस पूरे भू-भाग पर बौद्ध धर्म के जो सुबूत मिलते हैं वो सिद्ध करते हैं कि इस भिक्षु ने बोधिवृक्ष के बीज को बड़ी निष्ठा से बोया था, श्रम से रखवाली की थी, उसे हरियाया-फरियाया था, हरा-भरा किया था।
जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्मों का उल्लेख मिलता है। ये कथाएँ महायान शाखा की ग्रंथ-संपदा का हिस्सा हैं। थेरवादी इनकी प्रामाणिकता पर संदेह करते हैं लेकिन साहित्यिक दृष्टि से ये अनमोल रचनाएँ हैं। ये कथाएँ नीति व सदाचार की प्रेरक व रोचक कहानियाँ हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। जातक कथाएँ ही कालांतर में ‘पंचतंत्र’ की कहानियों का आधार बनीं।
ईसा की छठी शताब्दी में जरथुस्त नरेश खुसरु के आदेश पर जातक कथाओं का फारसी भाषा में अनुवाद हुआ। आठवीं शताब्दी में ये सीरियाई और अरबी भाषा में अनुवादित हुई- कलिनाग और दामनाग नाम से। जातक कथाओं का फारसी अनुवाद ही भविष्य में ग्रीक, लैटिन व हिब्रु भाषाओं में अनुवाद का आधार बना, जिन्हें चौदहवीं शताब्दी में संत बाइज़ेन्टाईन ने ‘एसप की कथाएँ’ नाम से संकलित किया। फिर यही कथाएँ आगे चलकर ‘सिंदबाद की कहानियाँ’ तथा ‘अरब की रातें’ (दि अरेबियन नाइट्स) के रूप में परिवर्तित हो गईं। ‘सिंदबाद की कहानियाँ’ तक आते-आते, आठवीं शताब्दी तक, जातक कथाओं के पात्र व पृष्ठभूमियाँ बदल गए, उन्होंने स्थानीय अरबी तथा फारसी रूप ले लिए।
फारसी और अरबी संस्कृति में जातक कथाओं को अप्रतिम लोकप्रियता मिली। मध्य-पूर्व एशिया में किसी भी ग्रंथ का शायद इतनी भाषाओं में अनुवाद नहीं हुआ, जितना कि अकेले इस एक ग्रंथ का- जातक कथाओं का- जो कि अब ‘सिंदबाद की कहानियाँ’ नाम से अधिक लोकप्रिय है। इन कहानियों पर अनेक चित्रकथाएँ छपी हैं, फिल्में तक बन चुकी हैं।
आठवीं शताब्दी में दमिश्क के संत जॉन ने बुद्ध की जीवनी का ग्रीक भाषा में अनुवाद किया – ‘बलाम और जोसाफट की कहानी’ नाम से। जोसाफट, जो वस्तुतः बोधिसत्त्व शब्द का ग्रीक उच्चारण है, इतने लोकप्रिय हो गए कि चौदहवीं शताब्दी तक कैथोलिक गिरजाघरों में वह संत जोसफ के रूप में पूजे जाने लगे। अब ईसाई संतों में उनकी संत जोसफ के रूप में गिनती होती है। वह एक मिथकीय संत हैं, जिनकी ऐतिहासिकता के बारे में ईसाइयत मौन है।
पाँचवीं शताब्दी में इस्लाम का उदय हो जाने से मध्य-पूर्व एशिया तथा खाड़ी देशों में बौद्ध धर्म पर वैसा विधिवत् अध्ययन व क्रमिक साहित्य-सृजन नहीं हो सका जैसा कि अन्य बौद्ध देशों में हुआ था। अतः इस पूरे परिक्षेत्र में बौद्ध धर्म की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए स्थानीय साहित्य, बोलचाल के शब्द, लोकाचार, रीति-रिवाजों में बौद्ध धर्म के चिह्न ढूँढ़कर निकालने पड़ते हैं।
जैसे अरबी भाषा का शब्द है- बुत, जिसका अर्थ होता है- मूर्ति। यह ‘बुत’ शब्द वस्तुतः ‘बुद्ध’ शब्द का अरबी रूपांतर है। अरबी लेखकों ने भारतीयों द्वारा पूजित देव अथवा मूर्ति के लिए ‘अल बुद्द’ शब्द का प्रयोग किया है। यह शब्द भी ‘बुद्ध’ शब्द की ओर संकेत कर रहा है। इसी प्रकार ‘अल बुदासफ’ शब्द ‘बोधिसत्त्व’ शब्द का अरबी उच्चारण है, बौद्ध साधुओं के लिए ‘सुमनिय्यास’ शब्द मिलता है जो पालि के ‘समन’ या संस्कृत के ‘श्रमण’ शब्द से व्युत्पन्न है।
तेरहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध अरबी-फारसी इतिहासकार रशीद-अल-दीन ने अरबी में अनुवादित लगभग ग्यारह ग्रंथ, जो कि अरबी-फारसी साहित्य में घुल-मिल गए थे, बौद्ध सूत्रों के रूप में पहचाने हैं, जिनमें ‘सुखावती व्यूह सूत्र’, ‘करंड व्यूह सूत्र’, ‘मैत्रेय व्याकरण’ (आंशिक), ‘अंगुत्तर निकाय’ तथा ‘संयुक्त निकाय’ के ग्रंथ प्रमुख हैं।
दसवीं शताब्दी के फारसी इतिहासकार इब्न-अल-फकीह और तेरहवीं शताब्दी के सीरियाई इतिहासकार वाकूत ने बल्ख़ में एक बौद्ध स्तूप होने की बात स्वीकार की है, जिसमें बौद्ध भिक्षु कुछ कर्म-कांड करते थे। इस्लाम के रहस्यवादी सूफ़ीमत का उदय भी बल्ख़ से ही हुआ। सूफियों का प्रारंभिक नायक इब्राहीम इब्न अदम आठवीं शताब्दी में बल्ख़ से ही भारत आया। राहुल सांकृत्यायन भी शोधात्मक निष्कर्ष देते हैं कि सूफ़ियों का उदय श्रमणों और भिक्षुओं से हुआ।
वस्तुतः सूफी किसी समय श्रमण और भिक्षु ही थे। इस्लाम के उदय के बाद उनका अपनी भूमि से अर्थात भारत से धार्मिक संपर्क कट गया तो उन्होंने स्थानीय मान्यताओं में से ही सूफी मत को जन्म दिया।
सूफियों के सारे रीति-रिवाज बौद्ध भिक्षुओं व श्रमणों के नीति-नियमों का परिवर्तित रूप हैं। यथा, श्रमणों की तरह परिव्राजक जीवन जीना, घूमते रहना। सूफ़ीमत में परिव्राजकों को ‘कलंदर’ कहते हैं। भिक्षुओं की तरह कासा अर्थात् कटोरा यानी भिक्षा-पात्र धारण करना, भिक्षा माँगना। चीवर की तरह विशेष लिबास पहनना। किसी सूफी सिलसिले में उस लिबास को ‘कमली’, कहीं ‘गुदड़ी’ और कहीं ‘कफनी’ कहते हैं। सूफियों में भी बौद्ध पंथों की तरह गुरु-शिष्य परंपरा है। वह पंथ या परंपरा को ‘सिलसिला’ कहते हैं। सूफियों में भी दीक्षा का विधान है। मरते वक्त बुजुर्ग फ़कीर जिस भी योग्य मुरीद अर्थात् शिष्य को अपना लिबास और कासा दे देता है, वही सिलसिले का अगला वारिस अर्थात् उत्तराधिकारी होता है। यह परंपरा भी बौद्धों से आई। बौद्धों के जेन मत में यह प्रथा अभी भी प्रचलित है।
यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि सूफी मत का चरम विकास भी अंततः भारतीय उपमहाद्वीप में ही हुआ। बाबा फरीदुद्दीन (पाक), ख्वाजा मुइनुद्दीन (अजमेर), ख्याज़ा कुतुबुद्दीन (दिल्ली), हज़रत निजामुद्दीन (दिल्ली), साबिर कलियरी (कलियर, बिहार), वारिस शाह (देवाशरीफ), बंदा नवाज़ गेसूदराज़ (गुलबर्गा, कर्नाटक), शाहमीना शाह वाली (लखनऊ), मीरा साहेब (मिरज-सांगली, महाराष्ट्र), शेख सलीम चिश्ती (फतेहपुर) आदि पूरे भारत में सूफी सिलसिले के विख्यात संत हुए हैं।
अबूबक्र हरीरी सूफ़ी की परिभाषा करते हैं- ‘संपूर्ण शुभाचरणों से पूर्ण, संपूर्ण दुराचरणों से मुक्त।’ और शहाबुद्दीन सुहरवर्दी परिभाषित करते हैं- ‘पवित्र जीवन, त्याग और शुभ गुण जहाँ इकट्ठा हों।’
इन परिभाषाओं के प्रकाश में, बौद्धों के शील और विनय सूफियों के भी आदर्श रहे हैं।
भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि-अवशेषों पर आठ स्तूप बनवाए गए। दो स्तूप और भी बनवाए गए जिसमें क्रमशः भगवंत के अंतिम संस्कार में प्रयुक्त हुए बर्तन तथा फूल (राख) स्थापित किए गए।
भगवान् बुद्ध के समकालीन प्रधान भिक्षुओं-सारिपुत्र, मौदगल्यायन, महाकाश्यप, आनंद आदि के निर्वाण के बाद भी उनके अस्थि-अवशेषों पर स्तूप बनवाए गए। साँची स्तूप में सारिपुत्र, मौदगल्यायन के अस्थि-अवशेष अभी भी रखे हैं।
तब से बौद्धों में यह परंपरा रही है कि मठ अथवा विहार के प्रमुख की मृत्यु के बाद उसके अस्थि-अवशेषों पर स्तूप बनाया जाता है।
स्तूप-निर्माण के पीछे बहुत बड़ा आध्यात्मिक विज्ञान रहा है। आध्यात्मिक रूप से उन्नत योगी, साधु, भिक्षु, संत, फ़कीर के शरीरांत के बाद भी उसके अवशेष ऊर्जामय रहते हैं। वह ऊर्जा ग्रहणशील श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक विकास में मदद करती है।
इसी स्तूप परंपरा ने सूफियों में मज़ार या दरगाह का रूप ले लिया। फर्क यह हो गया कि भारतीय बौद्धों में शरीर का अग्नि संस्कार किया जाता था और सूफ़ियों में दफनाया जाता है।
मध्यकाल की संत परंपरा में संतों के देहावसान के बाद उनकी समाधि बनाने का प्रचलन शुरू हुआ। स्तूप, समाधि और मज़ारें आध्यात्मिक ऊर्जा का एक जाग्रत केंद्र होती हैं।
सूफी फकीरों ने तो फ़कीर माना ही उसे है जिसकी समाधि भी जाग्रत हो। सत्रहवीं शताब्दी के पंजाब के सूफ़ी फ़कीर सुल्तान बाहू के कलाम की एक पंक्ति है:
नाम फ़कीर तिना दा बाहू
कब्र जिना दी जीवे हू
-बाहू, फ़कीर उन्हें कहते हैं जिनकी कब्र, मज़ार भी जीवित होती है।
और, सूफ़ी फ़कीरों ने अपने गुरु के लिए ‘बुत’ शब्द का प्रयोग भी किया है। बुत, जो कि ‘बुद्ध’ शब्द से व्युत्पन्न है। सुल्तान बाहू की ही पंक्तियाँ हैं:
की होया बुत दूर गया जे
दिल हरगिज दूर न थीवे हू
सौ कोहाँ ते वसदा मुरशिद
विच्च हुजूर दिसीवे हू
-क्या हुआ जो मेरा बुत, अर्थात् गुरु, दूर चला गया, दिल दूर नहीं होना चाहिए। मेरा मुरशिद, गुरु, सैकड़ों हाथ दूर रहता है, मगर मैं उसे, अपने हुजूर को, अपने दिल में देख लेता हूँ।
इसी प्रकार सूफ़ियों का ‘फकीर’ शब्द भी बौद्धों के ‘भिक्षु’ शब्द का समानार्थी है।
ये सभी संदर्भ सूफ़ियों के बौद्धों से घनिष्ठ अंतर्संबंधों को दर्शाते हैं।
फारस, अरब, ईरान व अन्य खाड़ी देशों तथा यूनान में बौद्ध धर्म की गतिविधियों को तीन चरणों में देखा जा सकता है।
प्रथम चरण में, ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचारक यूनान देशों तथा गांधार एवं कम्बोज (वर्तमान ईरान) में भेजे, इस काल में बौद्ध धर्म का सघन केंद्र बल्ख, बैक्ट्रिया के आसपास केंद्रित रहा। ये दोनों भू-भाग वर्तमान अफगानिस्तान में हैं। ईरान के उत्तर-पूर्वी नगर खुरासान तक पहुँचते-पहुँचते वह उतना प्रभावी नहीं रह गया।
ईरान प्राचीनकाल में ‘कम्बोज’ कहलाता था। बौद्ध गतिविधियों के कारण शताब्दियों बाद वह भू-भाग ईरान हो गया। ‘ईरान’ शब्द पालि के ‘अरिय’ अथवा संस्कृत के ‘आर्य’ शब्द के अपभ्रंश उच्चारण से बना है। बौद्ध शब्दावली में ‘अरिय’ या ‘आर्य’ शब्द श्रेष्ठ, शाश्वत, स्वामी, त्रिकाल सत्य आदि के अर्थों में प्रयुक्त हुआ है- चार आर्य सत्य, आर्य अष्टांगिक मार्ग, आर्यभूमि, आर्यसंघ आदि बुद्ध की देशनाओं में बार-बार प्रयुक्त हुए हैं। ‘आर्य’ शब्द से व्युत्पन्न होकर कम्बोज भू-भाग ‘आर्यान’ और बाद में ‘ईरान’ हो गया। ईरान में अभी भी आर्य मेहर यूनिवर्सिटी है और ‘आर्य मेहर’ उस देश का सर्वोच्च राजकीय सम्मान भी है, जो 1978 में सम्राट् रज़ा पहलवी को मिला था। कालांतर में ‘आर्य ‘ शब्द नस्लवाद से भी जोड़कर देखा जाने लगा, जिस कारण वर्तमान भारतीय इतिहास में आर्य-अनार्य का विवाद अभी तक चल रहा है।
बौद्धों और यूनानियों के सम्मिलन का चरम विकास हमें ईसा पूर्व 150 में यूनानी राजा मिनांडर के काल में दिखाई देता है जब भिक्षु नागसेन ने राजा के पाँच सौ एक दार्शनिक व आध्यात्मिक प्रश्नों के अकाट्य जवाब देकर इस सम्राट् को बौद्ध बना लिया। यूनानी राजा मिनांडर, जो अब बुद्ध भक्त मिलिन्द हो गया था, और भिक्षु नागसेन का प्रसिद्ध संवाद ‘मिलिंद पन्हो’ अर्थात् ‘मिलिंद-प्रश्न’ पुस्तक में संगृहीत हैं। यह पुस्तक एक धर्मग्रंथ की तरह ‘त्रिपिटक’ में शामिल है।
राजा मिलिंद के राज्य की मुख्य राजधानी सागल (वर्तमान पाकिस्तान की स्यालकोट) नगरी थी और उपराजधानी वालीक नगर (अब के अफगानिस्तान का बल्ख) था। उसी काल में यूनान की मूर्तिकला का गांधार कला से मिलन हुआ और मूर्तिकला की गांधार शैली विकसित हुई। गांधार शैली की बुद्ध-मूर्तियों में यूनानी कला की मांसलता और भारतीय कला की आध्यात्मिकता का समन्वित रूप दिखाई देता है।
दूसरे चरण में बौद्ध धर्म का विकास बौद्ध व्यापारियों के उपासक वर्गों द्वारा हुआ। ईसा की दूसरी शताब्दी तक भारत से अरब तक एक सजीव व्यापारिक मार्ग तैयार हो गया था, जो सिंध, अफगानिस्तान, खाड़ी से होते हुए भूमध्य सागर तक जाता था। दक्षिण भारत की रेशम की अरब देशों में बहुत माँग थी। बैक्ट्रिया और गांधार के रास्ते इतनी अधिक रेशम का निर्यात होता था कि इतिहास में उसे ‘रेशम-मार्ग’ ही कहा जाने लगा था। इस व्यापारी मार्ग पर यात्रियों-व्यापारियों की सुविधा के लिए, व्यापारियों के ही योगदान से, अनेक सराय, विहार, मठ आदि की शृंखला-सी निर्मित होती चली गई। पहाड़ी रास्तों पर गुफाएँ निर्मित हुईं, जिनकी दीवारों पर बुद्ध की जीवन-गाथाएँ शिल्पित की गईं। पहाड़ के पहाड़ तराशकर बुद्ध की मूर्तियाँ प्रकट कर दी गईं। बामियान की विशाल बुद्ध-मूर्ति उसी सजीव शृंखला का एक नमूना थी, जिसे मार्च, 2002 में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने ध्वस्त कर दिया। बौद्ध मूर्तिकला में मथुरा-शैली के बाद गांधार-शैली ने ही मूर्तिकला का चरम उत्कर्ष प्राप्त किया है। अफगानिस्तान का केंद्रीय संग्रहालय आज भी बुद्ध-मूर्तियों से भरा हुआ है।
व्यापारियों के साथ सिर्फ वस्तुओं का ही विनिमय नहीं होता बल्कि उनके साथ शब्द और परंपराएँ भी यात्रा करती हैं। शब्दों की यात्रा में कदाचित् साहित्यकारों से भी अधिक व्यापारियों का योगदान है।
यूनान के लोगों को भारत की इलायची बहुत पसंद थी, इसलिए संस्कृत में इलायची का नाम ही हो गया- यवनप्रिय। नाटकों में पर्दे का प्रचलन सर्वप्रथम यूनान में हुआ। इसलिए संस्कृत नाटकों में पर्दे के लिए ‘यवनिका’ शब्द रचा गया। गणित भारत की देन है, इसलिए अरबी में गणित को- इल्मे हिंदसाँ- कहा जाने लगा।
इसी व्यापारिक काल में बुत, अल-बुद्द, बुदासफ, बहार, नवबहार, बरमक आदि शब्द भी अरबी भाषा में शामिल हो गए। ‘बहार’ शब्द ‘विहार’ से बना है। ‘नवबहार’ शब्द ‘विहार’ अर्थात् नवनिर्मित विहार के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । ‘बरमक’ शब्द संस्कृत के ‘प्रमुख’ शब्द का अपभ्रंशित रूप है। ‘प्रमुख’ वस्तुतः ‘विहार प्रमुख’ के अर्थ में प्रयोग होता था। आठवीं-नवीं शताब्दी तक बल्ख़ के आसपास ‘बरमक’ नाम का बाकायदा एक वंश बन गया था। अरबी लेखकों ने ‘बरमक’ शब्द को बल्ख़ शहर के नवबहार पूजा-स्थल के ‘मुख्य पुजारी’ के अर्थ से व्युत्पन्न पाया है। निश्चित ही वह ‘नवबहार’ बल्ख़ का कोई नवनिर्मित विहार रहा होगा जिसके प्रमुख कालांतर में बरमक हो गए। फारसी में ‘नवबहार’ शब्द ‘नवीन मठ’ अथवा ‘मदरसा’ के अर्थों में भी प्रयुक्त होता है। मदरसों ने ही वर्तमान इस्लामी अध्ययन केंद्रों का रूप ले लिया। फारस का ‘नवबहार’ मठ किसी समय बौद्ध विश्वविद्यालयों की शैली पर इस्लामी अध्ययन का विशाल केंद्र रहा है। भारत के वर्तमान प्रांत बिहार का नामकरण भी बारहवीं शताब्दी के मुस्लिम शासकों द्वारा ही किया गया। गुलाम वंश के संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति मुहम्मद बख्तियार खिलजी ने जब सन् 1157 में नालंदा के नौमंजिले ग्रंथालय एवं विहार को कोई सैन्य किला समझकर ध्वस्त किया, बौद्ध ग्रंथों के विशाल संग्रह में आग लगा दी, तब प्रारंभ में उस परिक्षेत्र को मुस्लिम शासकों ने ‘बहार’ नाम दिया, जो बाद में ‘बिहार’ बन गया।
सुप्रसिद्ध इतिहासकार अल-बैरूनी, 11 वीं शताब्दी में, लिखता है- ‘खुरासान, पेरसिस, इराक, मोसुल और सीरिया तक का भू-भाग बौद्ध था।’
अभी आठवीं शताब्दी के शुरू तक, ई ० 712 में, मुहम्मद बिन कासिम के भारतीय सीमा पर आक्रमण के समय तक, सिंध में बौद्ध शासक दाहिर का शासन हुआ करता था। उसके ब्राह्मण मंत्री चच ने मुहम्मद बिन कासिम से षड्यंत्र करके दाहिर की हत्या कर दी। तब से सिंध का द्वार भारत पर आक्रमण के लिए हमेशा के लिए खुल गया। चच स्वयं राजा हो गया। उसने बौद्धों पर भयंकर अत्याचार किए।
इतिहासकार प्रोफेसर सुरेन्द्रनाथ सेन का मत है कि मुस्लिम आक्रमणों द्वारा बौद्ध जबरन ही मुसलमान नहीं बने बल्कि ब्राह्मण शासकों के अत्याचारों से पीड़ित होकर स्वेच्छा से भी बड़ी संख्या में बौद्ध मुसलमान हो गए।
तीसरा चरण फारस पर मंगोल शासकों के आधिपत्य के साथ शुरू होता है। तेरहवीं शताब्दी में, ई. 1256 में, मंगोलों के इल्खानीद वंश ने फारस पर कब्जा कर लिया। मंगोलिया के खान पहले ही बौद्ध हो चुके थे। उन्हें तिब्बतियों ने बौद्ध बनाया था। लगभग चालीस वर्षों तक, जब तक फारस के मंगोल शासक गाज़ान खाँ ने ई. 1295 में इस्लाम स्वीकार नहीं कर लिया, फारस में बुद्ध विहारों व मठों का खूब निर्माण हुआ, बौद्ध धर्म की गतिविधियों को संरक्षण दिया गया। लेकिन नव मुस्लिम बने मंगोल शासक गाज़ान खाँ ने अपने पूर्वजों के किए-धरे पर पानी फेर दिया- उसने विहारों व मठों को ध्वस्त कर देने अथवा उन्हें मस्जिदों में तब्दील कर देने का शासकीय आदेश निकाल दिया। वैसा ही हुआ भी।
परिणामस्वरूप फारस की प्राचीन मंगोल राजधानी मारागेह के निकट रसतखानेह और वरजुवी की गुफाओं, जो अब इस्लामी रूप ले चुकी हैं, में आज की अजंता-एलोरा का रूप देखा जा सकता है और काकेशश के दागिस्तान में गुंबदनुमा विशाल भवन को कोई भी स्तूप के रूप में पहचान सकता है, जिसके शिखर पर ध्वजा भी फहरा रही है- अब बौद्धों का पंचशील ध्वज नहीं बल्कि इस्लामी ध्वज।
बौद्धों के साहस, उत्साह और प्रयासों की परीक्षा हमेशा होती रही है। बुद्धि बल में तो वे पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाते रहे, बुद्ध की धम्म-सत्ता कायम करते रहे, लेकिन चूँकि वे भगवंत के अहिंसा व्रत से स्वभावतः बँधे हैं, इसलिए हिंसात्मक अवरोध देखकर ‘साधु-साधु-साधु’ कहते हुए प्रायः शांत हो गए, क्योंकि घृणा व हथियार मैत्री और करुणा की भाषा नहीं समझते।
बौद्धों ने फारस नरेश उल्दजैतू (ULDJAITU) खाँ (ई. 1305-16) को बुद्ध अनुयायी बनाने का एक प्रयास और किया, फिर अंततः वे बौद्ध स्वयं ही सूफी बनकर उग्र इस्लाम की नरम शाखा बन गए। आगे चलकर इस्लाम की बढ़ोतरी में तलवार से ज्यादा सूफ़ियों के प्यार ने योगदान दिया है।
(“बुद्ध का चक्रवर्ती साम्राज्य”, पुस्तक से। इस आलेख को बिना सन्दर्भ के उपयोग करना काॅपीराइट के विधिक दायरे में आता है।)

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मन को मंगल कामनाओं से भर देने को भगवान बुद्ध ‘मैत्री भावना’ कहते हैं !

🔔🔔🔔 मैत्री भावना 🔔🔔🔔

मन को मंगल कामनाओं से भर देने को भगवान बुद्ध ‘मैत्री भावना’ कहते हैं !

मैत्री भावना करनेवाला : —

1. सुख की नीँद सोता है
2. तरोताज़ा जागता है
3. दुःस्वप्न नहीँ आते
4. मनुष्योँ मेँ प्रिय होता है
5. अमनुष्योँ मेँ प्रिय होता है
6. देवता उसकी रक्षा करते है
7. अग्नि,विष,शस्त्र उसे मार नहीं सकते
8. सहज समाधिस्थ हो सकता है
9. मुखाकृति शांत होती है
10. मृत्युशैया पर मूढ़ नहीं मरता
11. मरने पर अच्छी गति होती है !

मैत्री देते वक्त : —

अप्रिय, अतिप्रिय, बैरी, विजातीय को पहेले न दें।
खुद को, माँ बाप व आचार्य को, प्रिय मित्र को, अपरिचित को और अंत में बैरी को…इस क्रम में मैत्री दें।
बैरी के लिए मैत्री न जगे तो…
1. बाक़ी आगेवाले सब को बार बार देते रहें ।
2. बुद्ध के मेत्तासुत्तों को याद करें…जिसमें ककचोपमावादसुत्त में कहते हैँ किः मेरे एक एक अंग को आरी से काटे, फिर भी मेरे मन में उसके लिए मेत्ता ही रहे।
3. सोचोः उसने तो मुझे एकबार दुःखी करना चाहा, मैँ खुद को बारबार दुःखी क्यों कर रहा हूँ ?
4. उसके किये हुए उपकारों को याद करें ।
5. सोचोः वह बेचारा ! हम से बैर रखकर भवचक्र में पीसेगा!
6. सोचोः उसने मुझको दुःखी किया वह उसका क्षेत्र, मेरा चित्त तो मेरा क्षेत्र है, मेरे क्षेत्र में मैं मेत्ता जगाऊँ !
7. कर्म का सिद्धांत हैः उसे बैर जगाने का फल मिलेगा…और मैं मेत्ता नहीँ जगाऊँगा तो मुझे भी मिलेगा।
8. सोचोः इस स्थिति में भगवान बुद्ध क्या करते ?
9. सोचोः मेरे अनंत जन्मों में कहीं न कहीं वह मेरा भाई, बहन, माँ, बाप, पति, पत्नी, बेटा, बेटी…रहा होगा ?
10. मेत्ता के फायदे याद करें ।
11. उसके नामरूप का पृथक्करण करके देखें, वह भी तो उत्पादव्यय का पुँज ही तो है! मैं किस पर क्रोध कर रहा हूँ ? उसकी पृथ्वी धातु पर ? अग्नि धातु पर ? वायु धातु पर ? जल धातु पर ? या फिर उसके विञ्ञाण पर ? सञ्ञा, वेदना, संस्कार पर ?
12. फिर भी न जगे तो उसे कोई उपहार दें। यदि वह भी देना चाहे तो अगर वह सम्यक आजीविका वाला हो तो स्वीकार करें ।

🌹🌹🌹 सबका मंगल हो 🌹🌹🌹

मंदिर प्रवेश के प्रारंभ में घंटा क्यो होता है? देवदासी प्रथा क्या है?

मंदिर प्रवेश के प्रारंभ में घंटा क्यो होता है???

देवदासी प्रथा ब्रह्मणी संस्कृति का एक पुराना और काला अध्याय है।

उस प्रथा मे ‘ब्राह्मण’ गरीब आदिवासी या शूद्र (ओबीसी )की छोटी बालिकाओं को देवताओ को समर्पित होने का नाम देकर उनके माता पिता से दूर कर मंदिर में हवस का शिकार बनाता था।

ब्राह्मण मंदिर के गर्भगृह में देवदासी छोटी फूल सी बालिकाओं का जब मन चाहे तब बलात्कार करता था।

देवदासीओं की स्थिति नर्क सी थी

कई छोटी बालिकाएँ खून बहने से या विशाल काय पुजारी के उनके ऊपर चढ़ने पे श्वास ना ले पाने से मर जाती थीं।

मंदिर के बिल्कुल बाहर गेट पर घंटा इस लिए लटकाया जाता था।

ताकि घंटा बजने पर ब्राह्मण को पता लग सके कि कोई आया है।

और वो धर्म के नाम पे लोगों को मूर्ख बनाकर मिली बच्चीयों के साथ जानवर से भी बदतर और मानवता के लिए कलंकित काम करता है उस हैवानियत पे पर्दा डाल सके।

घंटा एक अलार्म का काम करता था।

समाज के लिये सबसे बड़ा अभिशाप : “ब्राह्मण “

ब्राह्मण का न तो कोई धर्म है न कोई जाति है बल्कि वह एक योजनाबद्ध तरीके से पढ़े लिखे समाज को मूर्ख बनाने की व्यवस्था में लगा रहता है। पढ़िये:—–!!

1 जन्म से पहले ब्राह्मण

2 जन्म के बाद ब्राह्मण

1 शादी से पहले ब्राह्मण

2 शादी वाले दिन ब्राह्मण

1 गाड़ी लेने से पहले ब्राह्मण

2 गाड़ी बेचने से पहले ब्राह्मण

1 एग्जाम से पहले ब्राह्मण

2 परिणाम से पहले ब्राह्मण

3 परिणाम के बाद ब्राह्मण

1 घर की नीव पर ब्राह्मण

2 घर बन जाने के बाद ब्राह्मण

1 कोई हादसा होने पर ब्राह्मण

2 ठीक होने के बाद फिर ब्राह्मण

1 दवाई असर न करे तो ब्राह्मण

2 ज्यादा कर जाए तो भी ब्राह्मण

1 कोई काम न बना तो ब्राह्मण

2 काम बनते ही फिर ब्राह्मण

1 मृत्यु आने से पहले ब्राह्मण

2 मृत्यु होने के बाद ब्राह्मण

1 मृत्यु भोज से पहले ब्राह्मण

2 मृत्यु भोज पर भी ब्राह्मण

1 हवन करने पर ब्राह्मण

2 दूसरे का बुरा करने पर ब्राह्मण

इत्यादि और भी आप जोड़ लें।………..

अब फायदा देखो:

ये जितने भी कर्मकाण्ड मैने नोटिस किये है इनमे सिर्फ और सिर्फ नुक्सान हमारे समाज का है और फायदा केवल और केवल ब्राह्मण का है।

ब्राह्मण की दीर्घायु का कारण और आर्थिक रूप से सम्पन्न होने का कारण।

ब्राह्मण भी हमारी तरह इंसान है लेकिन उसके खाने में और हमारे खाने में जमीन आसमान का अंतर है हमारे अधिकांश भाई बहन जिन फल,सब्जी, जूस और ड्राईफ्रूट्स को तब खाते है जब हम बीमार पड़ते है और डॉक्टर हमारे लोगो को सलाह देता है कि न खाओगे तो मरोगे।

लेकिन ब्राह्मण बचपन से लेकर मृत्यु तक यही सब आहार लेता है और उसे इसके खरीदने की कोई टेंसन नही है क्योकि उसकी सेवा में हमारा 90% समाज लगा हुआ है इतनी सेवा तो उसका परिवार भी नही करता है जितना ख्याल इनका हमारा समाज रखता है।

अब ये बीमार क्यों पड़ेंगे और क्यों जल्दी मरेंगे क्योकि हम जो इन्हें जिन्दा रखते है।

अब जो पैसा ये समाज को मूर्ख बनाकर लेते है वो इन्हें खर्च करने की जरूरत नही पड़ती और हमारे लोग जीवन भर कर्जमुक्त नही हो पाते और इसी क्लेश और टेंसन में हमारे लोग बीमार और अल्पायु में ही मर जाते।

हमारे समाज को अगर तरक्की करनी है तो इन ऐसे पोगां पंडितो का त्याग करना जरूरी है। इनका बहिष्कार कर दो ये परजीवी प्रजाति खुद ही खत्म हो जायेगी।

पाखंडवाद को त्यागकर वैज्ञानिक शिक्षा एव वैज्ञानिक जीवन शैली अपनाकर ही देश का विकास हो सकता है.

🙏जय भीम जय भारत

जय संविधान 🙏

154 विधान सभा शवायजपुर 2021 में कुशवाहा समाज के प्रधानो की सूची

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

खदिया नगला भरखनी जिला हरदोई

भारतीय जातीय व्यवस्था,परम आदरणीय रजनी कांत शास्त्री जी की कलम से

यादव क्षत्रिय से अहीर-भट्टी राजपूत से नाई आदि
ब्राह्मणि बढ़ई आदि
जाति-परिवर्तन द्वारा जिस प्रकार कितनी जातियाँ हिन्दू समाज के निम्न
स्तरों से उटकर ऊपर की चली गई है, उसी प्रकार कितनी ही जातियाँ ऊपर से
नोचे को चली आई है। उदाहरणत:, यदुवंशीय क्षत्रिय राजकुमार आहुक के
वंशधर अहीर हो गए। शक्तिसंगमतंत्र में लिखा है, “आहुक वंशात् समुद्भुता:
आभीरा इति प्रकीर्तिताः”, अर्थात् अहीर आहक के वंश में उत्पन्न कहे गए है।
समर्थन
जातिविवेकाध्याय के
भी होता है।
यथा-“आहुक जन्मवन्तश्च आभीराः क्षत्रियाऽभवन् ।” अर्थात, आहुक के जन्मे
हुए क्षत्रिय अहीर हो गए। इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि अवश्य ही कुछ
यदुवंशीय क्षत्रिय अवनति को प्राप्त होकर गोपालन आदि अहीरोचित कर्म
करते करते अहीरों में जा मिले हैं, पर आजकल उनकी पहचान मुश्किल है,
जिसका फल यह हया कि सभी अहीर अब अपने को यादव अत्रिय कहने लग
गए हैं। इसी पकार भट्टीवंशीय क्षात्रय फूल और केवल की सन्तान नाई आर
कुम्हार, रके छों की सन्तान (बनिए, देसाऊ, देकाऊ) के वंशधर सुतार और
बढई तथा देवसी के वंशज ऊँटपाल हो गए। टॉड साहब के ‘राजस्थान’ में
जैर लमेर का इतिहास पदिए। इसी प्रकार की जातीय अवनति कुछ पाचाल
ब्राह्मणों की भी हो गई। पांचाल देश के कतिपय ब्राह्मण बई, लोहार, सोनार
आदि शिल्पियों की जीविका लेकर क्रमश: ब्राह्मणि बदई, ब्राह्मणिए लोहार,
ब्राह्मणि सनार आदि संज्ञक जातियों के रूप में विर्तित हो गए। इनमें अभी
तक ब्राह्मणोचित संस्कार, रीक्रिस्म, आप, गादि प्रचलित हैं जिन्हें देखकर
भारत के विद्वानों ने उक्त प्रतियों को उपद्राह्मणों में स्वीकृत कर लिया है। पर
अंधेर तो यह कि उक्त
ब्राह्मणिए बढ़ाईय, लोहारा सोनारों आदि की

देखादेखी सब के सब संकरवर्ण तथा शूद्र-वर्णी बढ़इयों, लोहारों, सोनारों आदि
ने भी, जो चिरकाल से संस्कारहीन थे और जिनमें मद्य-मांसादि का सेवन तथा
विधवाओ का पत्यन्तर-ग्रहणादि शूद्रोचित कर्म अभी तक प्रचलित हैं,
लम्बी-लम्बी चोटियाँ सिर पर रखकर, ललाट में तिलक छापे लगाकर, गले में
जनेऊ तथा पैरों में खड़ाऊँ पहनकर परस्पर ‘पंडितजी-पंडितजी’ कहते और
नमस्कार करते हुए अपने को पांचाल ब्राह्मण बन जाने के लिए सिरतोड़
परिश्रम कर रहे हैं। इनमें से कितने ही अपने को विश्वकर्मा की सन्तान होने
के आधार पर विश्वकर्मा ब्राह्मण बतलाते तथा विश्वकर्मा की रथयात्रा
निकालकर उनकी जयन्ती मनाते है। पर ‘विश्वकर्मा’ शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त
होता है, (२) जगत्स्रष्टा, और (२) देवशिल्पी। यदि पहला अर्थ लिया जाए तो
नि:शेष मनुष्य जगत्स्रष्टा की सन्तान होने से विश्वकर्मा ब्राह्मण और इसी से
बढ़ड़यों के सजाति हो जायेंगे, जो नहीं हो सकता। और यदि दूसरा अर्थ
लिया जाए तो देवशिल्पी विश्वकर्मा तथा उनकी स्त्री का वर्ण-निर्णय होना
चाहिए, जिससे उनकी सन्तान का वर्ण-निर्णय हो सके। ‘वर्णविवेकचन्द्रिका’ के
३६वें श्लोक के आधार पर विश्वकर्मा ब्रह्मा के चरण से उत्पन्न होने के
कारण शूद्र है और उनके
पुत्र भी शूद्र हैं,

ब्रह्माश्चरणज्जज्ञे विश्वकर्मा प्रतापवान् ।
तस्यात्म जाश्चदुर्द्धर्षाः शूद्रवर्णोप्रतिष्ठिताः ।। ३६ ॥

अर्थ प्रतापी विश्वकर्मा ब्रह्मा के चरण से उत्पन्न हुए और उनके
दुर्द्धर्षपुत्र शूद्र वर्ण में रखे गए। दुर्द्धर्ष वह है जिस पर आक्रमण करना कठिन
है। दाद्धर्ष-दुरतिक्रम। पुन: श्लोक ३७-३९
के
अनुसार,

इन विश्वकर्मा ने मन्मथ गोप की प्रभावती नामक कन्या से विवाह कर
उसमें मालाकार, कर्मा, शंकुकार, कुविन्दक, कुंभकार और कंसकार, ये छह
पुत्र उत्पन्न किए जो सभी शूद्र वर्ण में स्थित हैं। इनमे बढ़इयों का कहीं भी
पता नहीं है और यदि उनका पता भी होता तो वे भी शूद्र वर्ण में ही रखे
शूद्र हैं,
जाते।
‘विष्णु-रहस्य’ के अनुसार विश्वकर्मा वैश्य है। ‘जातिभास्कर’
, पृ० २०८,
श्लोक ३० पढ़िए,

अश्विनौ धनिदो विश्वकर्मा विद्याधरादयः।
वैश्यवर्णः पतिर्ते पां धनदं व्यदधाद्धरिः॥ ३० ॥

अर्थ-दोनो अश्विनीकुमार, कुबेर विश्वकर्मा और विद्याधरादि ये
वैश्यवर्ण वाले हैं। भगवान् विष्णु ने कुबेर को इन लोगों का स्वामी बनाया।
‘विष्णुपुराण’ प्रथम अंश अध्याय १५, श्लोक ११८-२१ के अनुसार विश्वकर्मा
आठवे बसु प्रभास के द्वारा देवगुरु बृहस्पति की बहिन में उत्पन्न हुए लिखे
गए हैं। बाह्मण-निर्णय’, पृ० ४०५ पढिए,

वृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्माचारिणी।
योगसक्ता जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत् ॥
प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य च ।
विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः॥

अर्थ-वृहस्पति की बहिन सुन्दरी और ब्रह्मचारिणी थी। वह योग-बल से
सब जगत् में घूमा करती थी। वह वसुओं में आठवे बसु प्रभव की स्त्री थी।
उसके गर्भ से बड़े भागवाले विश्वकर्मा नामक प्रजापति उत्पन्न हुए।
विष्णु-रहस्य के अनुसार प्रभास क्षत्रिय है। जातिभास्कर, पृ० २०७,
श्लोक ८० पढिये,

इन्द्र प्रद्युम्न चन्द्रार्क बसु रुद्रादयोऽपरे।
मरुतः क्षत्रवर्णत्वाज्जज्ञिरे क्षत्रजीविकाः॥ १० ॥

अर्थ-इन्द्र, प्रद्युम्न, चन्द्र, वसु, रुद्रादि तथा अन्य देवगण क्षत्रिय वर्ण होने
से क्षत्रजीविका वाले हुए।

अब प्रभास-पुत्र विश्वकर्मा का वर्ण-निर्णय कीजिए। प्रभात एक वसु होने
के कारण क्षत्रिय है और उनकी स्त्री वृहस्पति की बहिन होने के कारण ब्राह्मणी
हुई। अत: विश्वकर्मा क्षत्रिय पिता के द्वारा ब्राह्मणी माता में उत्पन्न होने
कारण मन्वादि धर्मशास्त्रकारों के मत जातित: ‘सूत’ हुए जिसका काम रथ
हाँकना है। देवशिल्पी विश्वकर्मा का ब्राह्मण होना कहीं भी लिखा नहीं मिलता
है। यदि बढ़ई भाइयों के सन्तोष के लिए विश्वकर्मा को ब्राह्मण भी मान लें
तो भी इन भाइयों का ब्राह्मण होना सिद्ध नहीं होता, क्योंकि विश्वकर्मा ने जिस
स्त्री में बढ़इयों को उत्पन्न किया था, वह शूद्रा थी और ब्राह्मण पिता द्वारा शूद्रा
माता में उत्पन्न हुई सन्तान ब्राह्मण न होकर ‘पारशव’ होती है। ‘जातिभास्कर’,
पृ० १९४ तथा १९५ में उद्धृत ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मखंड, अध्याय १०, श्लोक
१९,२० और २१ पढ़िए-

विश्वकर्मा च शूद्राया वीर्याधानं चकार सः।
ततो बभूवः पुत्राश्च नवैते शिल्पकारिणः ॥ १९ ॥
मालाकार: कर्मकारः शंखकार: कुविन्दकः ।
कुंभकार: कंसकार: षडेते शिल्पिना वराः ॥ २० ॥
सूत्राधारश्चित्रकार: स्वर्णकारस्तथैव च।
तास्ते
वर्णसंकराः ॥ २१ ॥

अर्थ-विश्वकर्मा ने शूद्रा में वीर्याधान किया जिससे शिल्पकर्मा के ९
पुत्र हुए। इन ९ शिल्पियों में मालाकार (माली), कर्मकार (लोहार), शंखकार
(शंख की चीजें बनाने वाले), कुविन्दक (जुलाहा), कुम्हार और केसरा, ठठेरा,
तमेड़ा आदि ये ६ श्रेष्ठ हैं तथा सूत्रधार (बढ़ई), चितेरा और सोनार ये तीन
ब्रह्मशाप के कारण पतित और अयाज्य वर्ण-संकर है। अयाज्य वे हैं जिनको
यज्ञकर्म का अधिकार नहीं है।

पहले दिन ब्राह्मणिए बढ़इयों आदि उपब्राह्माणों का उल्लेख हुआ है,
उनका इन विश्वकर्मा से कोई वंश का सम्बन्ध नहीं मालूम पड़ता, सिवा इसके
कि उन लोगों ने विश्वकर्मा के वंशजों का पेशा अख्तियार कर लिया है।
उनकी उत्पत्ति ब्राह्मणोत्पत्तिमार्तण्ड में लिंगपुराणोक्त शैवागम के आधार पर यों
लिखी है कि ब्रह्मा के पुत्र स्वयंभुव मनु ने शिल्पायन, गौरवायन, कायस्थायन
और मागधायन इन चार उपब्राह्मणों को उत्पन्न किया। इनमें शिल्पायन को
सन्तान लोहार, सुनार (बदई), पथरकट, तमेड़े और सोनार हैं। पर शैवागम से
किस ग्रन्थ का अभिप्राय है, यह ‘बाह्माणोत्पत्तिमार्तण्ड’ में नहीं लिखा और
लिंगपुराण में यह कथा नहीं मिलती। अत: इसकी प्रामाणिकता अविश्वसनीय
है।
। अनुमान होता है कि ब्राह्मणिए बढ़ई आदि मूलतः ब्राह्मण ही हैं, पर
पुश्त-दर-पुश्त शिल्पियों का धन्धा करते चले आने से बाह्मणत्व से गिरकर
उपब्राह्मण हो गये। ब्राह्मणिए बदइयों और ब्राह्मणिए सोनारों की तरह क्षत्रिय
बढ़ई और क्षत्रिय सोनार भी होते हैं जो मूलतः क्षत्रिय थे। इसी प्रकार चमर
बढ़ई भी होते हैं जो मूलत: चमार थे।

परम आदरणीय रजनी कांत शास्त्री जी की कलम से साभार:-

नमो बुद्धाय 🙏🙏🙏
जय भीम 🙏🙏🙏
भवतु सब्ब् मंगलम् 🙏
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

जागो और जगाओ अंधविश्वास भगाओ विज्ञान अपनाओ🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

क्या यह नाथूराम गोडसे अंग्रेजो के खिलाफ एक भी दिन जेल गया था? Yadunandan Lal Verma Lodhi Rajput

क्या यह नाथूराम गोडसे अंग्रेजो के खिलाफ एक भी दिन जेल गया था?
क्या इस नाथूराम गोडसे ने अंग्रेजों पर एक भी गोली चलाई थी?
यदि यह क्रातिकारी था तो क्या इसने क्रांतिकारियों की कोई मदद की थी?
नाथूराम गोडसे को मुसलमानों का अत्याचार तो दिखाई पड गया लेकिन ब्राह्मण जो दलितों पिछडो पर अन्यान्य अत्याचार करते वह दिखाई क्यो नही पडा?
न जाने कितने मुसलमानों ने हंसते हंसते देश की आजादी पर अपनी कुरवानी दे दी। क्या इस नथुआ गोडसे को मुसलमानों की देशभक्ति दिखाई पडी?
पाकिस्तान के विभाजन का असली गुनाहगार देश की सबर्ण जातियां हैं विशेषकर ब्राह्मण थे जो दलितों पिछडो को कुत्ता बिल्ली के बराबर भी नही मानते।
यदि गांधीजी मुसलमानों का पक्ष ले रहे थे तो यह बात सुभाष चंद्र बोस सरदार भगतसिंह सरदार पटेल आदि किसी क्रांतिकारी ने यह आरोप गांधीजी पर क्यो नही लगाया?
नाथूराम गोडसे आर एस एस का सदस्य रह चुका था। आर एस एस अंग्रेजो का साथ दे रहा था। पाकिस्तान के जनक आर एस एस हिंदू महासभा जैसे संगठन थे। जिन्ना नास्तिक थे। उनके पूर्बज हिंदू थे।
यदि पाकिस्तान का विभाजन न होता तो दलितों और मुसलमानों के गठबंधन से देश की सत्ता दलितों पिछडो और अल्पसंख्यकों के हाथ मे पंहुच जाती।
पाकिस्तान के विभाजन का सबसे बडा फायदा ब्राह्मणों को हुआ।
अबिभाजित भारत मे मुसलमानों के 1947से पहले मुसलमान 35%नौकरियों में थे।
पाकिस्तान विभाजन मुसलमानों की भागीदारी मात्र 1%रह गयी। कांग्रेस शासन मे रिक्त पदो पर ब्राह्मणों की नियुक्तियां की गई। इस समय सरकारी नौकरियों मे ब्राह्मण 80%बैठा हुआ है।

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Yadunandan Lal Lodhi ki qalam se

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